कैसे बीते दिवस हमारे,
हम जानें या राम बेचारे।
रेहन उम्र समय के हाथों,
पथ में लुटे सपन बंजारे.
सुधियों के जब दीप जलाये,
क्षत-विक्षत सब मिले हमारे.
जीवन का हर पल हरजाई,
कश्ती से छिन गए किनारे।
उड़ना था जिस मन पाखी को,
विवश कैद में पंख पसारे।
योवन की हर बाज़ी, यारो,
सबसे जीते, ख़ुद से हारे.
लहरों के झूठे आश्वासन,
ढोते रहे प्यास के मारे.
मौसम का सन्यासी निशदिन,
क़दम-क़दम पर टोना मारे।
मन के,ओ विषपायी आँगन,
दुआ करो अब मंदिर-द्वारे।
:गीत-ग़ज़ल संग्रह-'सुधियों के पलाशवन' से
रचनाकाल-६ नवम्बर,१९८६