जहाँ सागर हैं वहीँ तूफ़ान होंगे
आग सीने में लिए इंसान होंगे
जितने गहरे दर्द अब सागर कहाँ
वो सफ़ीने बेवज़ह हैरान होंगे
खो गयी लहरें,किनारे प्यास से
मेरे घर इन दिनों मेहमान होंगे
मांझियों के गीत बोझिल हो गए
मछलियों के देश भी वीरान होंगे
बह रहा हूँ एक दरिया की तरह
कोई सागर तो मेरी पहचान होंगे
(११ अक्टूबर,१९८७)