Saturday, April 30, 2011

जहाँ सागर हैं वहीँ तूफान होंगे

जहाँ सागर हैं वहीँ तूफ़ान होंगे
आग सीने में लिए इंसान होंगे

जितने गहरे दर्द अब सागर कहाँ
वो सफ़ीने बेवज़ह हैरान होंगे

खो गयी लहरें,किनारे प्यास से
मेरे घर इन दिनों मेहमान होंगे

मांझियों के गीत बोझिल हो गए
मछलियों के देश भी वीरान होंगे

बह रहा हूँ एक दरिया की तरह
कोई सागर तो मेरी पहचान होंगे

(११ अक्टूबर,१९८७)

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को
अब न पालो इन बहानों को

रोशनी का ख्वाब तोड़ने के लिए
यूँ न जलाओ अपने अरमानों को

दिल के जलने से खौफ़ होता ही
कहीं आग न लग जाये मकानों को

उनके हाथों में सियासत की शमा
क्या कहें मुल्क के परवानों को

मेरे ज़मीर की कीमत लगा रहे शायद
जिनकी बंदिश ने तपाया मेरे बयानों को

(२२ दिसंबर,१९७७)