Saturday, April 30, 2011

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को
अब न पालो इन बहानों को

रोशनी का ख्वाब तोड़ने के लिए
यूँ न जलाओ अपने अरमानों को

दिल के जलने से खौफ़ होता ही
कहीं आग न लग जाये मकानों को

उनके हाथों में सियासत की शमा
क्या कहें मुल्क के परवानों को

मेरे ज़मीर की कीमत लगा रहे शायद
जिनकी बंदिश ने तपाया मेरे बयानों को

(२२ दिसंबर,१९७७)






No comments:

Post a Comment