Wednesday, October 19, 2011

आंसू जो बह जाते है...

आंसू जो बह जाते है
अपना दायित्व निभा देते हैं
शेष आंसू ढूँढते हैं...
दर्द की कोई नई परिभाषा
***श्रवण***

दरिया का रुख जैसे ठहरा हुआ है...

सन्नाटा जब बहुत गहरा हुआ है
सांसों पर बड़ा कड़ा पहरा हुआ है
ये ज़िंदगी लगी है कुछ ऐसी,यारो
दरिया का रुख जैसे ठहरा हुआ है
***श्रवण***

Saturday, October 15, 2011

इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर...

घर से चले थे हम तो वीराने की तलाश में
बेहद घबरा गए हैं यहाँ पर बाज़ार देखकर

बहकी फिजां में घूमना हसरत नहीं रहीअब
यूँ ही निकल पड़े थे कुछ इश्तहार देखकर

शीशे-सा चटखता है अब पत्थरों का सीना
इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर

रूठा हुआ है हर दरख़्त अपने ही साये से
हम हैं उलझन में,अपनों का प्यार देखकर

खून-ए-जिगर न होगा,अब मौत है तसल्ली
हर डाक्टर ख़ामोश है,हम-सा बीमार देखकर
***श्रवण***

Friday, October 14, 2011

मनवा भारी हो रहा,चुभी पराई पीर...

सन्यासी सा मन हुआ,बाँझ हुई हैं बाहें
छोडो बीता जो भी,कुछ अनचाहा चाहें

चटक चांदनी घर-घर,बांटे मीठी खीर
मनवा भारी हो रहा,चुभी पराई पीर

वन-कन्या के लाज से,रक्तिम हुए कपोल
मन हो गया बावरा,जीवन हुआ अमोल

Saturday, October 8, 2011

आग सीने में लिए फिरता हूँ...

आग सीने में लिए फिरता हूँ
मैं समंदर से बहुत डरता हूँ

अच्छे हालात बचा रखने को
मैं यहाँ बार-बार मरता हूँ

वो न आएंगे,मुझे मालूम है
फिर भी यूँ इंतज़ार करता हूँ
+++श्रवण+++

Friday, October 7, 2011

आस्था और विश्वास के साथ...

आस्था और विश्वास के साथ
बाहें फैलाओगे,मेरे मित्र,
तो
यह समूचा आकाश
ख़ुद-ब-ख़ुद उनमें
समां जायेगा....
***श्रवण***

Monday, October 3, 2011

पाया कि अब टूटी पतवार हैं लोग...

ऊपर से तो बेहद ईमानदार हैं लोग
बेईमानी के लेकिन इश्तेहार हैं लोग

कश्ती की दहशत को देखा-समझा
पाया कि अब टूटी पतवार हैं लोग