Saturday, October 15, 2011

इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर...

घर से चले थे हम तो वीराने की तलाश में
बेहद घबरा गए हैं यहाँ पर बाज़ार देखकर

बहकी फिजां में घूमना हसरत नहीं रहीअब
यूँ ही निकल पड़े थे कुछ इश्तहार देखकर

शीशे-सा चटखता है अब पत्थरों का सीना
इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर

रूठा हुआ है हर दरख़्त अपने ही साये से
हम हैं उलझन में,अपनों का प्यार देखकर

खून-ए-जिगर न होगा,अब मौत है तसल्ली
हर डाक्टर ख़ामोश है,हम-सा बीमार देखकर
***श्रवण***

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