Monday, March 5, 2012

ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

उनकी आँखों में रज़ामंदी तो हमने देख ली है
अब ज़रा अपने भी दिल से,उसकी मर्ज़ी जान लूं

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शमां की मानिंद हम रात भर जलते रहे
मोम का पर्याय बन ख़्वाब भी गलते रहे
वो ज़माने भर की पीड़ा मेहरबां हम पर रही
दर्द के दानव हमारे दिल में यूँ पलते रहे

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बहुत भारी पड़ा है हम पे अपना ही मुकद्दर
किसी मुफ़लिस सी है अब ज़िंदगी, यारो
हमें नफ़रत नहीं,अपना ज़रा सा प्यार देकर
हमारी भी यहाँ बिखरी हुई दुनिया संवारो

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मैं कोई बुत बना फिरता हूँ पत्थर के शहर में
ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

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तुम ही समझो हम यहां बर्बाद या आबाद हैं
ज़िंदगी की क़ैद में पर हम बहुत आज़ाद हैं

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ

अंधेरों का जशन और तू भी शामिल हो गया उसमे
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ
बहुत बेबाक हैं अब आईने भी

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हमारे बीच ये वर्षों से जमी ख़ामोशी
बर्फ के साथ चलो एक बार पिघलें हम

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यहाँ अमृत वगैरह की कभी उम्मीद मत करना
हलाहल ही मिलेगा तुमको गर कुछ भी मिलेगा

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हाले-ए-दिल तेरा रक़ीबों को बताने के लिए
हाले-ए-दिल अपना सुनाता हूँ तुझे तफ़सील से

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कुछ इस दिल ने कहा...

कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं

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चाहा था मैंने डूबना उन झील सी आँखों में
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में

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दर्द के बदले ख़ुशी मिलने लगी है आज कल
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग

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मेरे ज़ख्मों पे जो गुज़रा वो हंसी मंज़र न पूछ
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा

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हाय ! मेरे दिल पे उनका वो यकीं जाता रहा
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का

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इधर हालात बद से और बदतर होते जाते हैं
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ

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उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं

उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है

आंसुओं को पी के भी बुझती नहीं है प्यास इनकी
ये सियासत के सितम की दु:खद-सी पहचान हैं

हम-वतन और हम-जबां होकर भी हमसे दूर हैं
क्यों यहां इनके लिए ख़ामोश हर फ़रमान है ?

हैसियत कोई भी हो पर ज़िंदगी तो ज़िंदगी है
क्या करें, इस तथ्य से ख़ाली हुआ संविधान है

वतन की तस्वीर में, वो रंग भर कर होगा क्या
जब तलक लोगो के सब कुचले हुए अरमान हैं
***श्रवण*** (०५ फरवरी,२०१२)

Sunday, February 19, 2012

हिमाक़त हो गई है

ये नींद आंखों से मेरी क्यूं दूर हो गयी ?
अबे ! गोली इक नींद की खा तो सही !

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क्यों बार-बार मेरा रास्ता काटता है तू ?
ये काम बिल्ली को करने दे न,यार !

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यह हिमाक़त हो गई है मुझसे मेरी दिलरुबा
गिर पड़ा हूँ मैं तेरी रुखसार की उन खाईयों में
***श्रवण***

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कहीं उलझ न जाये फिर से ज़िंदगी, यारो
उनके बालों के ये ख़म मुझको दुआ देते हैं
***श्रवण***

मगर ही कहते हैं

वो चाहे ग़म के हों या ख़ुशी के आंसू
यहाँ के लोग मुझे मगर ही कहते हैं
***श्रवण***

दस्तक देने वाली हैं

कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं
***श्रवण***