Wednesday, January 12, 2011

राजधानी व्यस्त है,चुनाव है..

ज़िंदगी टूटी हुई-सी इक नाव है
बेबसी, नदी का इक बहाव है

भटकनों के शहर में हर आदमी
भीड़ में दर्द का इक ठहराव है

हममें, तुममें और हर इंसान में
प्यार की कोशिश नहीं,अलगाव है

बंदिशें अपने बयां पर ढोता हुआ
इन्सां नहीं,यह दहकता अलाव है

आग सीने में छिपाए क्या करे
सियासत की बर्फ़ से टकराव है

उतनी भीगी हुई ऑंखें नहीं हैं
जितने गहरे,पीर ओढ़े, घाव हैं

हर तरफ़ टूटे हुए हैं आईने
इस कदर इंसाफ़ में विखराव है

हादसों का दौर है, यारों यहाँ
भीड़ है, आक्रोश है, पथराव है

ज़िंदगी, तेरे लिए हम क्या करें
राजधानी व्यस्त है, चुनाव है

(१५ जुलाई,१९८४)

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