कितना बिखरा हुआ जीवन का सफ़र होता है
गैर के कदमो पे जब अपना ये सर होता है
ये गुलमोहर हैं,इन्हें प्यार से देखे न कोई
अब तो फूलों में भी काँटों का डर होता है
गीत लिखना भी अब ऐसे पत्थरों के लिए
कोरे कागज़ पे बस स्याही का ज़हर होता है
हम नहीं होते हैं जब दोस्तों की महफ़िल में
कितना ख़ामोश और बीमार शहर होता है
रोशनी के वास्ते फिर आग लगाओ कोई
हर अँधेरे के लिए मेरा ही घर होता है
उनके हिस्से में खिली धूप की ख़ुशबू महके
दर्द का सैलाब इधर आठो पहर होता है
अब वहां कोई फ़रियाद को जाया न करें
आजकल गुमशुदा आहों का असर होता है
उनकी चौखट पे हमने बार-बार सर पटका
वो बात और है कि प्यार सिफ़र होता है
गर कभी भेंट हुई अपनी ज़िंदगी से कहीं
हंस के पूछेंगे,कहो-कैसे बसर होता है?
@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@
Saturday, July 30, 2011
Thursday, July 21, 2011
भीगता है मेरा मन...
बारिश की बूंदों से
भीगती है धरती
भीगते हैं पेड़-पौधे
भीगती हो तुम,
और तुम्हे भीगता देखकर
भीगता है मेरा मन...
भीगती है धरती
भीगते हैं पेड़-पौधे
भीगती हो तुम,
और तुम्हे भीगता देखकर
भीगता है मेरा मन...
मुझमे ज़िंदा है मेरी ये ज़िंदगी यूँ...
क़तरा-क़तरा खुशियाँ हैं भीख-सी
पीर की नदियाँ समय की सीख-सी
मुझमे ज़िंदा है मेरी ये ज़िंदगी यूँ
सन्नाटों में जैसे किसी चीख-सी
श्रवण...२१.०७.2011
पीर की नदियाँ समय की सीख-सी
मुझमे ज़िंदा है मेरी ये ज़िंदगी यूँ
सन्नाटों में जैसे किसी चीख-सी
श्रवण...२१.०७.2011
Saturday, July 9, 2011
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां...(Revised)
हुक्मरां कर बंद ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां
ख़्वाब दिखलाते रहे ताउम्र हमको
और हम बुनते रहे लाचारियाँ
अब न कोई रास्ते न मंजिलें
ज़िंदगी का बोझ और दुश्वारियां
हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां
समय रहते सोच बदलो हाकिमों
या भूल जाओ अपनी थानेदारियां
@@@१०-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां
ख़्वाब दिखलाते रहे ताउम्र हमको
और हम बुनते रहे लाचारियाँ
अब न कोई रास्ते न मंजिलें
ज़िंदगी का बोझ और दुश्वारियां
हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां
समय रहते सोच बदलो हाकिमों
या भूल जाओ अपनी थानेदारियां
@@@१०-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
शोला बनने लगी हैं अब चिनगारियां...
हुक्मरानों बंद करो ये ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनने लगी हैं अब चिनगारियां
ज़िंदगी का दम यहाँ कैसे भरें हम
हर तरफ फैला दीं तुमने दुश्वारियां
अब न सपनों की यहाँ पर बात छेड़ो
सुलगती हैं हमारे मन में लाचारियाँ
इस वतन को तोड़ने की सोच भी
बहुत भारी पड़ेंगी ये गैरजिम्मेदारियां
समय रहते सोच को बदलो नहीं तो
हम हैं और अब हमारी कारगुजारियां
@@@०९-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
शोला बनने लगी हैं अब चिनगारियां
ज़िंदगी का दम यहाँ कैसे भरें हम
हर तरफ फैला दीं तुमने दुश्वारियां
अब न सपनों की यहाँ पर बात छेड़ो
सुलगती हैं हमारे मन में लाचारियाँ
इस वतन को तोड़ने की सोच भी
बहुत भारी पड़ेंगी ये गैरजिम्मेदारियां
समय रहते सोच को बदलो नहीं तो
हम हैं और अब हमारी कारगुजारियां
@@@०९-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Wednesday, July 6, 2011
भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है...
ये दिल कोई समंदर नहीं,एक तनहा सहरा है
दर्द का बियाबान जैसे सदियों से यहीं ठहरा है
पीड़ा के पर्वत लांघे सब, सपनों के बंजारों ने
समय के सिपाहियों का यूँ बड़ा सख्त पहरा है
चुभते हैं यादों के नश्तर शामों की तनहाई में
सुधियों से रिश्ता ही मन का इतना गहरा है
स्नेह के सन्दर्भ गहरी प्यास ले कर जी रहे
हाले-दिल हम किससे कहें,वो हरजाई बहरा है
रेहन है खुशियों की ख़ुशबू,प्यासे रेगिस्तानों को
भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है
@@@०५-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
दर्द का बियाबान जैसे सदियों से यहीं ठहरा है
पीड़ा के पर्वत लांघे सब, सपनों के बंजारों ने
समय के सिपाहियों का यूँ बड़ा सख्त पहरा है
चुभते हैं यादों के नश्तर शामों की तनहाई में
सुधियों से रिश्ता ही मन का इतना गहरा है
स्नेह के सन्दर्भ गहरी प्यास ले कर जी रहे
हाले-दिल हम किससे कहें,वो हरजाई बहरा है
रेहन है खुशियों की ख़ुशबू,प्यासे रेगिस्तानों को
भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है
@@@०५-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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