Wednesday, July 6, 2011

भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है...

ये दिल कोई समंदर नहीं,एक तनहा सहरा है
दर्द का बियाबान जैसे सदियों से यहीं ठहरा है

पीड़ा के पर्वत लांघे सब, सपनों के बंजारों ने
समय के सिपाहियों का यूँ बड़ा सख्त पहरा है

चुभते हैं यादों के नश्तर शामों की तनहाई में
सुधियों से रिश्ता ही मन का इतना गहरा है

स्नेह के सन्दर्भ गहरी प्यास ले कर जी रहे
हाले-दिल हम किससे कहें,वो हरजाई बहरा है

रेहन है खुशियों की ख़ुशबू,प्यासे रेगिस्तानों को
भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है

@@@०५-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

2 comments:

  1. पीड़ा के पर्वत लांघे सब, सपनों के बंजारों ने
    समय के सिपाहियों का यूँ बड़ा सख्त पहरा है

    खूब कहा..... बहुत बढ़िया रचना

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  2. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

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