Sunday, August 28, 2011

अब हमारे हाथों में वो हमारा संविधान है...

बंदिशों का न कहीं अब कोई नामोनिशान है
यारो,यह इस दौर का एक पुख्ता बयान है

संसद में क़ैद था जो लोकतंत्र के नाम पर
अब हमारे हाथों में वो हमारा संविधान है

आम ने फिर फेर दिया पानी मनसूबों पर
देश के दुश्मनों की बड़ी सांसत में जान है

एकता ने फिर दिखाया है वो अपना हुनर
भेड़ियों के चगुल से देखो छूटी कमान है

@@@@श्रवण@@@@ २८/०८/२०११

Wednesday, August 24, 2011

एकता का यही है अंदाज़...

हर तरफ से उठ रही आवाज़
हो न हो यह जंग का आगाज़

बढ़ रही है भेड़ियों में खलबली
एकता का यही है अंदाज़

हम तेरे कायल हैं,अन्ना मेरे
बहुत छोटा है मगर जांबाज़

@@@shrawan@@@

Tuesday, August 9, 2011

इश्क मांगे है तुमसे इज़हारे-वफ़ा...

जब दिल भी है और जुबान भी है,
फिर ख़ामोशियों की उड़ान क्यों है?
इश्क मांगे है तुमसे इज़हारे-वफ़ा,
शर्मो-हया की ये झूठी शान क्यों है?
@@@श्रवण@@@
०९-०८-२०११

Friday, August 5, 2011

जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये..

इंसानों की बस्ती में सब मिले पराये
जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये

हम तो ढोते रहे पिटारा इज्ज़त का
इज्ज़तदार बने वे अपनी आन मिटाये

उपदेशों का ज़हर हमारे हिस्से आया
धन-दौलत पर नेता अपनी नज़र गड़ाये

विषधर लिपटे हैं चन्दन की डालों से
और सपेरों ने हैं यहाँ अलख जगाये

आदर्शों की बातें कीं जन प्रतिनिधियों ने
इन्ही पिशाचों ने आखिर विष-वृक्ष लगाये

प्यार कभी देखा था लिखा किताबों में
अब तो ढाई आखर ने सब अर्थ गंवाये

रिश्ते जितने मिले खून के,नाखूनों जैसे
रस्मों के झूटे सब हमने जश्न मनाये

@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@
(०५ अगस्त,२०११)