Friday, August 5, 2011

जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये..

इंसानों की बस्ती में सब मिले पराये
जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये

हम तो ढोते रहे पिटारा इज्ज़त का
इज्ज़तदार बने वे अपनी आन मिटाये

उपदेशों का ज़हर हमारे हिस्से आया
धन-दौलत पर नेता अपनी नज़र गड़ाये

विषधर लिपटे हैं चन्दन की डालों से
और सपेरों ने हैं यहाँ अलख जगाये

आदर्शों की बातें कीं जन प्रतिनिधियों ने
इन्ही पिशाचों ने आखिर विष-वृक्ष लगाये

प्यार कभी देखा था लिखा किताबों में
अब तो ढाई आखर ने सब अर्थ गंवाये

रिश्ते जितने मिले खून के,नाखूनों जैसे
रस्मों के झूटे सब हमने जश्न मनाये

@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@
(०५ अगस्त,२०११)

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