कोई भी जाने न पहचाने
बनते हैं जाने भी अनजाने
यारों की बस्ती में आकर
देखा की मिलते हैं बेगाने
जीने की कैसी है मज़बूरी
खुशियों के झूठे क्यों बहाने
आँखों में चुभती है मंहगाई
घर में सुनिए बीबी के ताने
सुधियों के रिश्ते सब हरजाई
बंधन किस्मत में हैं मनमाने
स्याह हैं अपने बहुत अँधेरे
लुट गए शमा के वो खजाने
जबसे रूठी है ज़िंदगी हमसे
कोई भी आया नहीं मनाने
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
Sunday, September 25, 2011
Sunday, September 18, 2011
मैं तुम्हारा हो जाऊंगा..
तुम्हारे वे सारे मधुर स्पर्श
मुझे तुम्हारा होने नहीं देते...
जिस दिन मैं तुम्हारी रूह को
छू लूँगा,
मैं तुम्हारा हो जाऊंगा..
^^^श्रवण^^^ १८/०९/२०११
मुझे तुम्हारा होने नहीं देते...
जिस दिन मैं तुम्हारी रूह को
छू लूँगा,
मैं तुम्हारा हो जाऊंगा..
^^^श्रवण^^^ १८/०९/२०११
Thursday, September 15, 2011
यारो,ये कहाँ आ गए हम?
हवा भी नहीं लिखती है अब
वे स्पर्श-भरी चिट्ठियां,
देता नहीं आसमान भी
कभी नीली दुआएं,
दरख़्त सहलाते नहीं
ममताभरी छांव से,
सूरज भी जैसे
चल रहा वैशाखियों पर,
चाँद भी सृजित नहीं करता
वह मायावी संसार,
बस चारो तरफ कंक्रीट
मॉल,होटल और अट्टालिकाएं,
यारो,ये कहाँ आ गए हम?
@@श्रवण@@
वे स्पर्श-भरी चिट्ठियां,
देता नहीं आसमान भी
कभी नीली दुआएं,
दरख़्त सहलाते नहीं
ममताभरी छांव से,
सूरज भी जैसे
चल रहा वैशाखियों पर,
चाँद भी सृजित नहीं करता
वह मायावी संसार,
बस चारो तरफ कंक्रीट
मॉल,होटल और अट्टालिकाएं,
यारो,ये कहाँ आ गए हम?
@@श्रवण@@
Thursday, September 8, 2011
भेड़िये फिर से गुर्राने लगे हैं...
भेड़िये फिर से गुर्राने लगे हैं
देशभक्तों को सताने लगे हैं
जरा सी शांति क्या हुई कि
ये माहौल को भुनाने लगे हैं
ऐसे हालात के मद्देनज़र यूँ
हम आक्रोश को दबाने लगे हैं
आओ खुलकर फिर से वार करें
ये कहाँ अभी ठिकाने लगे हैं?
@@@श्रवण@@@
०७-०९-२०११
देशभक्तों को सताने लगे हैं
जरा सी शांति क्या हुई कि
ये माहौल को भुनाने लगे हैं
ऐसे हालात के मद्देनज़र यूँ
हम आक्रोश को दबाने लगे हैं
आओ खुलकर फिर से वार करें
ये कहाँ अभी ठिकाने लगे हैं?
@@@श्रवण@@@
०७-०९-२०११
Subscribe to:
Comments (Atom)