हवा भी नहीं लिखती है अब
वे स्पर्श-भरी चिट्ठियां,
देता नहीं आसमान भी
कभी नीली दुआएं,
दरख़्त सहलाते नहीं
ममताभरी छांव से,
सूरज भी जैसे
चल रहा वैशाखियों पर,
चाँद भी सृजित नहीं करता
वह मायावी संसार,
बस चारो तरफ कंक्रीट
मॉल,होटल और अट्टालिकाएं,
यारो,ये कहाँ आ गए हम?
@@श्रवण@@
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