Sunday, September 25, 2011

जीने की कैसी है मज़बूरी...

कोई भी जाने न पहचाने
बनते हैं जाने भी अनजाने

यारों की बस्ती में आकर
देखा की मिलते हैं बेगाने

जीने की कैसी है मज़बूरी
खुशियों के झूठे क्यों बहाने

आँखों में चुभती है मंहगाई
घर में सुनिए बीबी के ताने

सुधियों के रिश्ते सब हरजाई
बंधन किस्मत में हैं मनमाने

स्याह हैं अपने बहुत अँधेरे
लुट गए शमा के वो खजाने

जबसे रूठी है ज़िंदगी हमसे
कोई भी आया नहीं मनाने
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

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