Friday, May 6, 2011

हम पत्थरों के शहर में फिर खो गए...

जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...

शब्दों को छुआ नहीं
सदियों से हमने,
सुधियों को रेहन मन
जी रहा मौसम के
सपने ही सपने-

समझौते ओढ़कर,
हम बंधनों के ज़हर में
फिर खो गए...

अनुबंधों की बोझिल शर्तें
घर-आंगन हरजाई,
अर्थहीन मंजिल की भटकन
मन के जैसी तपती रेत
पावों फटी बिमाई-

अनचाहे मोड़ पर,
हम पराये सफ़र में
फिर खो गए...

यातना के शिविर में
बंधक है शावक-मन,
सपेरों के बीच यहाँ
विषधर गवाह बने
अपराधी चन्दन-वन-

भेड़ियों के देश में,
हम सभ्यता की लहर में
फिर खो गए...

जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...
(३१ अगस्त,१९८२)




यार, दो बोल मीठे बोल तो सही

आंगन में बिखरा है कितना सन्नाटा
यार, दो बोल मीठे बोल तो सही

इस जगह बहुत घना अँधेरा है
आँखों की रौशनी थोड़ा खोल तो सही

अब हमारे बीच कोई फासला नहीं
कानों में मीठा ज़हर घोल तो सही

मरा है ज़िस्म मगर दिल नहीं मरा
तू हाथ बढ़ा कर ज़रा टटोल तो सही

आसमां को चूमने की बात मत कर
अपने बाजुओं को पहले तोल तो सही

(
८ जून,१९७७)



फागुन-मन छला गया दर्द भरे फूल से...

बाँहों तक आकर
लौट गयी पुरवईया,
फागुन-मन छला गया
दर्द भरे फूल से...

प्यास के तटबंध ओढ़े
सपनों का मृग-छौना,
ओ! मेरे सगुन पाखी!
समय का सन्यासी कहीं
मारे न टोना-

सुधियों को कोंचती टिटिहरी,
स्वाती का पता पूछे
विषपायी बबूल से...

व्यथा के अभिशाप मिलते
पीढ़ियों के नाम पल-छिन,
ओ! मेरे माटी-आकाश!
चलो सहेजें पीर के
संवाद अनगिन-

नीड़ों से विस्थापित पंछी,
गाँव का पता पूछें
नदिया के कूल से...

चिलचिलाती धूप में
गोदभरी धरती टोहे छाँव,
ओ!मेरे मन के विश्वास!
कभी तो मिलेगी आख़िर
जीवन को ठांव -

व्यथा के मरुस्थलों को,
गुलमोहर के श्रृंगार भी
चुभते हैं शूल से...