बाँहों तक आकर
लौट गयी पुरवईया,
फागुन-मन छला गया
दर्द भरे फूल से...
प्यास के तटबंध ओढ़े
सपनों का मृग-छौना,
ओ! मेरे सगुन पाखी!
समय का सन्यासी कहीं
मारे न टोना-
सुधियों को कोंचती टिटिहरी,
स्वाती का पता पूछे
विषपायी बबूल से...
व्यथा के अभिशाप मिलते
पीढ़ियों के नाम पल-छिन,
ओ! मेरे माटी-आकाश!
चलो सहेजें पीर के
संवाद अनगिन-
नीड़ों से विस्थापित पंछी,
गाँव का पता पूछें
नदिया के कूल से...
चिलचिलाती धूप में
गोदभरी धरती टोहे छाँव,
ओ!मेरे मन के विश्वास!
कभी तो मिलेगी आख़िर
जीवन को ठांव -
व्यथा के मरुस्थलों को,
गुलमोहर के श्रृंगार भी
चुभते हैं शूल से...
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