जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...
शब्दों को छुआ नहीं
सदियों से हमने,
सुधियों को रेहन मन
जी रहा मौसम के
सपने ही सपने-
समझौते ओढ़कर,
हम बंधनों के ज़हर में
फिर खो गए...
अनुबंधों की बोझिल शर्तें
घर-आंगन हरजाई,
अर्थहीन मंजिल की भटकन
मन के जैसी तपती रेत
पावों फटी बिमाई-
अनचाहे मोड़ पर,
हम पराये सफ़र में
फिर खो गए...
यातना के शिविर में
बंधक है शावक-मन,
सपेरों के बीच यहाँ
विषधर गवाह बने
अपराधी चन्दन-वन-
भेड़ियों के देश में,
हम सभ्यता की लहर में
फिर खो गए...
जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...
(३१ अगस्त,१९८२)
Friday, May 6, 2011
हम पत्थरों के शहर में फिर खो गए...
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