तुम पे था ऐतबार,उन वादों का क्या हुआ
हिमालय से भी ऊँचे उन इरादों का क्या हुआ
चारो तरफ थे इश्क के आसार फिजाओं में
बुलबुल ये पूछती है की सयादों का क्या हुआ
***श्रवण***
Sunday, December 11, 2011
Saturday, December 10, 2011
जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले...
जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले
उन्ही लोगों में हमें बेसहारों के सहारे मिले
जिसने भी प्यार का इज़हार किया है खुलकर
उनकी आँखों में जो भी सपने थे, कुंवारे मिले
वो जिन्हें छू सकी न परछाइयों की बाजीगरी
ऐसे ख़ुद्दार कड़ी धूप में जीवन को संवारे मिले
वो जो फ़रयाद की कोशिश में जुटे हैं हर पल
उन्हें तसल्लियों के फिर से कुछ शरारे मिले
हमने हर लफ्ज़ को न जाने कितनी बार पढ़ा
जितने भी मुफ़लिसी में ख़त हमें तुम्हारे मिले
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
उन्ही लोगों में हमें बेसहारों के सहारे मिले
जिसने भी प्यार का इज़हार किया है खुलकर
उनकी आँखों में जो भी सपने थे, कुंवारे मिले
वो जिन्हें छू सकी न परछाइयों की बाजीगरी
ऐसे ख़ुद्दार कड़ी धूप में जीवन को संवारे मिले
वो जो फ़रयाद की कोशिश में जुटे हैं हर पल
उन्हें तसल्लियों के फिर से कुछ शरारे मिले
हमने हर लफ्ज़ को न जाने कितनी बार पढ़ा
जितने भी मुफ़लिसी में ख़त हमें तुम्हारे मिले
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
Friday, December 9, 2011
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में...
ज़िस्म तो रह रहे हैं शहर के मकानों में
क्यूँ रूहें भटकती हैं यूँ दूर बियाबानों में
ज़िस्म तन्हां हैं और रूहें बहुत प्यासी हैं
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में
दर्द के दावे मिले हमको विरासत में यहाँ
नाम शामिल हो गया अपना भी परवानों में
बढ़ गयी है बेरुखी,बढ़ने लगे हैं फासले भी
चलके अब ढूंढें कोई उन पुरानी पहचानों में
हर तरफ चेहरों की रंगत देखकर लगने लगा
क़ैद हैं रूहें यहाँ पर ज़िस्म के तहखानों में
***श्रवण***
क्यूँ रूहें भटकती हैं यूँ दूर बियाबानों में
ज़िस्म तन्हां हैं और रूहें बहुत प्यासी हैं
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में
दर्द के दावे मिले हमको विरासत में यहाँ
नाम शामिल हो गया अपना भी परवानों में
बढ़ गयी है बेरुखी,बढ़ने लगे हैं फासले भी
चलके अब ढूंढें कोई उन पुरानी पहचानों में
हर तरफ चेहरों की रंगत देखकर लगने लगा
क़ैद हैं रूहें यहाँ पर ज़िस्म के तहखानों में
***श्रवण***
Thursday, December 8, 2011
ये मेरी प्यास ...
दिल का जो द्वार तुमने खोल दिया है फिर से
ये मेरी प्यास दौड़ कर तेरे पास चली जाती है
***श्रवण***
ये मेरी प्यास दौड़ कर तेरे पास चली जाती है
***श्रवण***
Friday, December 2, 2011
सफ़र हो रोशनी में...
अंधेरों में चलोगे,कहाँ किसका साथ पाओगे
सफ़र हो रोशनी में तब तो साया साथ होगा
***श्रवण***
सफ़र हो रोशनी में तब तो साया साथ होगा
***श्रवण***
सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है....
सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है,
आसपास का हर चेहरा बहरा हो जाता है,
मूक पर्वत के सामने चिल्लाता हूँ ऊबकर,
अपना नाम लेकर--
अपनी ही आवाज़ सुनने के लिए...
***श्रवण***
आसपास का हर चेहरा बहरा हो जाता है,
मूक पर्वत के सामने चिल्लाता हूँ ऊबकर,
अपना नाम लेकर--
अपनी ही आवाज़ सुनने के लिए...
***श्रवण***
Thursday, December 1, 2011
क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं? ...
हमने वीरानियों के गाँव बसाये हैं
तभी हम पर बियाबानों के साये हैं
प्रगति और विकास की भागदौड़ में
क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं?
***श्रवण***
तभी हम पर बियाबानों के साये हैं
प्रगति और विकास की भागदौड़ में
क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं?
***श्रवण***
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