Friday, December 9, 2011

अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में...

ज़िस्म तो रह रहे हैं शहर के मकानों में
क्यूँ रूहें भटकती हैं यूँ दूर बियाबानों में

ज़िस्म तन्हां हैं और रूहें बहुत प्यासी हैं
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में

दर्द के दावे मिले हमको विरासत में यहाँ
नाम शामिल हो गया अपना भी परवानों में

बढ़ गयी है बेरुखी,बढ़ने लगे हैं फासले भी
चलके अब ढूंढें कोई उन पुरानी पहचानों में

हर तरफ चेहरों की रंगत देखकर लगने लगा
क़ैद हैं रूहें यहाँ पर ज़िस्म के तहखानों में

***श्रवण***

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