जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...
शब्दों को छुआ नहीं
सदियों से हमने,
सुधियों को रेहन मन
जी रहा मौसम के
सपने ही सपने-
समझौते ओढ़कर,
हम बंधनों के ज़हर में
फिर खो गए...
अनुबंधों की बोझिल शर्तें
घर-आंगन हरजाई,
अर्थहीन मंजिल की भटकन
मन के जैसी तपती रेत
पावों फटी बिमाई-
अनचाहे मोड़ पर,
हम पराये सफ़र में
फिर खो गए...
यातना के शिविर में
बंधक है शावक-मन,
सपेरों के बीच यहाँ
विषधर गवाह बने
अपराधी चन्दन-वन-
भेड़ियों के देश में,
हम सभ्यता की लहर में
फिर खो गए...
जंगलों से निकलकर,
हम पत्थरों के शहर में
फिर खो गए...
(३१ अगस्त,१९८२)
Friday, May 6, 2011
हम पत्थरों के शहर में फिर खो गए...
जहाँ सागर हैं वहीँ तूफान होंगे
जहाँ सागर हैं वहीँ तूफान होंगे
आग सीने में लिए इंसान होंगे
जितने गहरे दर्द,अब सागर कहाँ
वो सफ़ीने बेवजह हैरान होंगे
खो गयी लहरें,किनारे प्यास से
मेरे घर में इन दिनों मेहमान
मांझियों के गीत बोझिल हो गए
मछलियों के देश भी वीरान होंगे
बह रहा हूँ एक दरिया की तरह
कोई सागर तो मेरी पहचान होंगे
(११ अक्टूबर,१९८७)
सुधियों को कोंच गयी टिटिहरी!
आँखों में खिंची हुई दुपहरी,
मन ठहरा डेहरी पर आस भरा
सुधियों को कोंच गयी टिटिहरी!
प्राणों में चुभता है बियाबान,
नयनों में सपनों की भीड़ लिए
आंगन में बिखरा वैभव वीरान-
रेत भरी नदिया हुई गहरी,
अर्थहीन हो गए किनारे भी
आकर यह उम्र कहाँ ठहरी!
पैरों की किस्मत में भटकन,
विषपायी मैना की बातें रचतीं
विरह भरी चक्रव्यूह सी उलझन-
अब तो जीवन हुआ शहरी,
कैसे समझाएं अपनी बातें
नीम की छाया भी बहरी!
हमने जब होश को सम्हाला,
पतझर के मीत दिए समय ने
अंधेरों को समझ लिया उजाला-
यादों की बगिया सुनहरी,
कागज़ के फूल खिले निशदिन
टुकुर-टुकुर तकती गिलहरी!
(०१ अप्रैल,१९७६,भा.त.सं.,कानपुर
मन ठहरा डेहरी पर आस भरा
सुधियों को कोंच गयी टिटिहरी!
प्राणों में चुभता है बियाबान,
नयनों में सपनों की भीड़ लिए
आंगन में बिखरा वैभव वीरान-
रेत भरी नदिया हुई गहरी,
अर्थहीन हो गए किनारे भी
आकर यह उम्र कहाँ ठहरी!
पैरों की किस्मत में भटकन,
विषपायी मैना की बातें रचतीं
विरह भरी चक्रव्यूह सी उलझन-
अब तो जीवन हुआ शहरी,
कैसे समझाएं अपनी बातें
नीम की छाया भी बहरी!
हमने जब होश को सम्हाला,
पतझर के मीत दिए समय ने
अंधेरों को समझ लिया उजाला-
यादों की बगिया सुनहरी,
कागज़ के फूल खिले निशदिन
टुकुर-टुकुर तकती गिलहरी!
(०१ अप्रैल,१९७६,भा.त.सं.,कानपुर
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