Friday, May 6, 2011

सुधियों को कोंच गयी टिटिहरी!

आँखों में खिंची हुई दुपहरी,
मन ठहरा डेहरी पर आस भरा
सुधियों को कोंच गयी टिटिहरी!

प्राणों में चुभता है बियाबान,
नयनों में सपनों की भीड़ लिए
आंगन में बिखरा वैभव वीरान-

रेत भरी नदिया हुई गहरी,
अर्थहीन हो गए किनारे भी
आकर यह उम्र कहाँ ठहरी!

पैरों की किस्मत में भटकन,
विषपायी मैना की बातें रचतीं
विरह भरी चक्रव्यूह सी उलझन-

अब तो जीवन हुआ शहरी,
कैसे समझाएं अपनी बातें
नीम की छाया भी बहरी!

हमने जब होश को सम्हाला,
पतझर के मीत दिए समय ने
अंधेरों को समझ लिया उजाला-

यादों की बगिया सुनहरी,
कागज़ के फूल खिले निशदिन
टुकुर-टुकुर तकती गिलहरी!

(
०१ अप्रैल,१९७६,भा..सं.,कानपुर

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