Sunday, June 19, 2011

चुभती मन को पीर पराई...

मरने से क्या डरना,भाई
पग-पग पर हैं बसे कसाई

अधिकारों की बात चली है
चल कर छेड़ें एक लड़ाई

संविधान की धाराओं में
हमने अपनी शाख गंवाई

गली-मोहल्ले सुलग रहे हैं
तुमने ही यह आग लगाई

सपनों की ताबीर लिखें पर
चुभती मन को पीर पराई

खिड़की है पर दृश्य नदारद
उन्नति से यह मिली कमाई

सुख ने हमको प्यासा रक्खा
दुःख ने अपनी प्यास बुझाई

चुभते हैं सुधियों के नश्तर
मन के पैरों फटी विमाई

खिलना था फूलों को लेकिन
काँटों ने क्यों बाड़ बिछाई

जिन्दा रहने की कोशिश में
मुर्दों को मिल गई ख़ुदाई

सागर तक न पहुंची नदियाँ
किसने उल्टी गंग बहाई

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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