Saturday, July 9, 2011

शोला बनती हैं दबी चिनगारियां...(Revised)

हुक्मरां कर बंद ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां

ख़्वाब दिखलाते रहे ताउम्र हमको
और हम बुनते रहे लाचारियाँ

अब न कोई रास्ते न मंजिलें
ज़िंदगी का बोझ और दुश्वारियां

हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां

समय रहते सोच बदलो हाकिमों
या भूल जाओ अपनी थानेदारियां

@@@१०-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

1 comment:

  1. हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
    छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां... waah

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