हुक्मरां कर बंद ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां
ख़्वाब दिखलाते रहे ताउम्र हमको
और हम बुनते रहे लाचारियाँ
अब न कोई रास्ते न मंजिलें
ज़िंदगी का बोझ और दुश्वारियां
हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां
समय रहते सोच बदलो हाकिमों
या भूल जाओ अपनी थानेदारियां
@@@१०-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
ReplyDeleteछोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां... waah