Thursday, March 29, 2012

मेरे कन्धों से लग कर जो कभी रोता था ज़ार-ज़ार

बुतों को तू अगर छू ले,तो उनमें जान आ जाए
न कर मुझसे यही उम्मीद, कोई बुत नहीं हूँ मैं

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मेरी मुश्किल कि मैं ख़ुद को छिपाकर रख नहीं सकता
तेरी फ़ितरत किसी को मंच तक आने नहीं देती

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मेरे कन्धों से लग कर जो कभी रोता था ज़ार-ज़ार
वही करने लगा है अब मेरे रोने का, यारो, इंतज़ार

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खिजाओं ने बहारों को किराये पर लिया होगा
तभी तो सारे मौसम एक से मालूम होते हैं

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'' मेरे ज़ख्मों पे छिड़कते हैं नमक जी भर कर
और कहते हैं कि नमक में आयोडीन भी है.''
हसीनों पर फ़िदा होना हो गर,दरियाफ्त कर लेना
कि वे बस ज़िस्म हैं या दिल भी है उनके बदन में

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मेरे जज़्बात को तमग़े मिले रुसवाइयों के
हम अपने दर्द को ख़ुशियों की सज़ा दे न सके

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उनके ओठों से हंसी के घने फुहारे फूटते हैं,
जैसे रुक-रुक कर पानी के फव्वारे फूटते हैं.

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''ऐ नाज़नीनों, अपनी निगाहों से जुबां का काम करो,
और अपनी कैंची-सी जीभ से कहो कि आराम करो.''

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ज़िन्दगी ज़ंजीर में जकड़ी हुई जंजाल-सी
जाल को काटो मगर ये ज़िन्दगी कटती नहीं

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किस तरह अब कोई उनका दिल चुराए,दोस्तो

(क) किस तरह अब कोई उनका दिल चुराए,दोस्तो
रख दिया है दिल सभी ने,बैंक के उन लाकरों में
(ख) किडनियों के दाम अच्छे मिल रहे हैं, साथियों
कौन अहमक फिर यहाँ पर दिल चुराने जायेगा
(ग) दिल की नीलामी में यूँ तो बोलियाँ थीं लाख की
ले गया ज़ालिम मेरा दिल कौड़ियों के मोल पर
(घ) मैंने पूछा किस तरह तोड़ोगे मेरा दिल,सनम
हंसके वो मुझको नया बेलन दिखाने लग गए
(च) दिल को बच्चा समझकर वे ले गए थे साथ में
बाल-मज़दूरी का ज़ुर्म उन पे साबित हो चुका है
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Wednesday, March 14, 2012

सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार...

पाषाण-युग के नाम भेजो,दोस्तो,यह समाचार
सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार

बुतशिकन लिखने लगे हैं बुतपरस्ती पर किताबें
ज़िन्दगी के नाम मिलते दर्द के शुभ समाचार

पीढियां अब लिख न पाएंगी कभी इतिहास अपना
हो गए रेहन समय को, जिन पे था दारोमदार

पत्थरों के शहर में मिलती नहीं हैं मंज़िलें
चाहतों के नाम लिक्खे भटकनों के गमगुसार

मन के मंदिर में जिन्हें हम देवता कहते रहे
पत्थरों की कौम को करते रहे वो शर्मशार

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Monday, March 5, 2012

जब भी गुज़रा हूँ यहां मैं घनी तनहाइयों से
मेरा यह दर्द ही हमदर्द बनके साथ रहा.

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फिर तुम्हारी याद आयी-
पोर-पोर महके अमराई,
मन आंगन में
कूके कोयल
चहक रही तनहाई...
फिर तुम्हारी याद आयी

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ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

उनकी आँखों में रज़ामंदी तो हमने देख ली है
अब ज़रा अपने भी दिल से,उसकी मर्ज़ी जान लूं

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शमां की मानिंद हम रात भर जलते रहे
मोम का पर्याय बन ख़्वाब भी गलते रहे
वो ज़माने भर की पीड़ा मेहरबां हम पर रही
दर्द के दानव हमारे दिल में यूँ पलते रहे

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बहुत भारी पड़ा है हम पे अपना ही मुकद्दर
किसी मुफ़लिस सी है अब ज़िंदगी, यारो
हमें नफ़रत नहीं,अपना ज़रा सा प्यार देकर
हमारी भी यहाँ बिखरी हुई दुनिया संवारो

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मैं कोई बुत बना फिरता हूँ पत्थर के शहर में
ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

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तुम ही समझो हम यहां बर्बाद या आबाद हैं
ज़िंदगी की क़ैद में पर हम बहुत आज़ाद हैं

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ

अंधेरों का जशन और तू भी शामिल हो गया उसमे
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ
बहुत बेबाक हैं अब आईने भी

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हमारे बीच ये वर्षों से जमी ख़ामोशी
बर्फ के साथ चलो एक बार पिघलें हम

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यहाँ अमृत वगैरह की कभी उम्मीद मत करना
हलाहल ही मिलेगा तुमको गर कुछ भी मिलेगा

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हाले-ए-दिल तेरा रक़ीबों को बताने के लिए
हाले-ए-दिल अपना सुनाता हूँ तुझे तफ़सील से

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कुछ इस दिल ने कहा...

कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं

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चाहा था मैंने डूबना उन झील सी आँखों में
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में

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दर्द के बदले ख़ुशी मिलने लगी है आज कल
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग

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मेरे ज़ख्मों पे जो गुज़रा वो हंसी मंज़र न पूछ
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा

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हाय ! मेरे दिल पे उनका वो यकीं जाता रहा
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का

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इधर हालात बद से और बदतर होते जाते हैं
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ

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उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं

उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है

आंसुओं को पी के भी बुझती नहीं है प्यास इनकी
ये सियासत के सितम की दु:खद-सी पहचान हैं

हम-वतन और हम-जबां होकर भी हमसे दूर हैं
क्यों यहां इनके लिए ख़ामोश हर फ़रमान है ?

हैसियत कोई भी हो पर ज़िंदगी तो ज़िंदगी है
क्या करें, इस तथ्य से ख़ाली हुआ संविधान है

वतन की तस्वीर में, वो रंग भर कर होगा क्या
जब तलक लोगो के सब कुचले हुए अरमान हैं
***श्रवण*** (०५ फरवरी,२०१२)