बुतों को तू अगर छू ले,तो उनमें जान आ जाए
न कर मुझसे यही उम्मीद, कोई बुत नहीं हूँ मैं
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मेरी मुश्किल कि मैं ख़ुद को छिपाकर रख नहीं सकता
तेरी फ़ितरत किसी को मंच तक आने नहीं देती
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मेरे कन्धों से लग कर जो कभी रोता था ज़ार-ज़ार
वही करने लगा है अब मेरे रोने का, यारो, इंतज़ार
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खिजाओं ने बहारों को किराये पर लिया होगा
तभी तो सारे मौसम एक से मालूम होते हैं
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'' मेरे ज़ख्मों पे छिड़कते हैं नमक जी भर कर
और कहते हैं कि नमक में आयोडीन भी है.''
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ReplyDeleteअद्भुत!!!
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शुभ-कामनाएं।
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