Wednesday, March 14, 2012

सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार...

पाषाण-युग के नाम भेजो,दोस्तो,यह समाचार
सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार

बुतशिकन लिखने लगे हैं बुतपरस्ती पर किताबें
ज़िन्दगी के नाम मिलते दर्द के शुभ समाचार

पीढियां अब लिख न पाएंगी कभी इतिहास अपना
हो गए रेहन समय को, जिन पे था दारोमदार

पत्थरों के शहर में मिलती नहीं हैं मंज़िलें
चाहतों के नाम लिक्खे भटकनों के गमगुसार

मन के मंदिर में जिन्हें हम देवता कहते रहे
पत्थरों की कौम को करते रहे वो शर्मशार

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

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