Thursday, March 29, 2012

हसीनों पर फ़िदा होना हो गर,दरियाफ्त कर लेना
कि वे बस ज़िस्म हैं या दिल भी है उनके बदन में

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मेरे जज़्बात को तमग़े मिले रुसवाइयों के
हम अपने दर्द को ख़ुशियों की सज़ा दे न सके

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उनके ओठों से हंसी के घने फुहारे फूटते हैं,
जैसे रुक-रुक कर पानी के फव्वारे फूटते हैं.

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''ऐ नाज़नीनों, अपनी निगाहों से जुबां का काम करो,
और अपनी कैंची-सी जीभ से कहो कि आराम करो.''

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ज़िन्दगी ज़ंजीर में जकड़ी हुई जंजाल-सी
जाल को काटो मगर ये ज़िन्दगी कटती नहीं

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