Saturday, July 30, 2011

दर्द का सैलाब इधर आठो पहर होता है...

कितना बिखरा हुआ जीवन का सफ़र होता है
गैर के कदमो पे जब अपना ये सर होता है

ये गुलमोहर हैं,इन्हें प्यार से देखे न कोई
अब तो फूलों में भी काँटों का डर होता है

गीत लिखना भी अब ऐसे पत्थरों के लिए
कोरे कागज़ पे बस स्याही का ज़हर होता है

हम नहीं होते हैं जब दोस्तों की महफ़िल में
कितना ख़ामोश और बीमार शहर होता है

रोशनी के वास्ते फिर आग लगाओ कोई
हर अँधेरे के लिए मेरा ही घर होता है

उनके हिस्से में खिली धूप की ख़ुशबू महके
दर्द का सैलाब इधर आठो पहर होता है

अब वहां कोई फ़रियाद को जाया न करें
आजकल गुमशुदा आहों का असर होता है

उनकी चौखट पे हमने बार-बार सर पटका
वो बात और है कि प्यार सिफ़र होता है

गर कभी भेंट हुई अपनी ज़िंदगी से कहीं
हंस के पूछेंगे,कहो-कैसे बसर होता है?

@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@

1 comment:

  1. गीत लिखना भी अब ऐसे पत्थरों के लिए
    कोरे कागज़ पे बस स्याही का ज़हर होता है
    bahut hi gahri abhivyakti

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