Tuesday, November 1, 2011

जितनी बड़ी रस्में,उतने घायल रिश्ते हैं...

किसी भी बात पर हम देर तलक हँसते हैं
छोटे-बड़े घाव अपने इसी तरह रिसते हैं

अपनी वासनाओं के अँधेरे में भटके हुए
हव्वा नहीं,हम तो आदम के फ़रिश्ते हैं

रस्मों और रिश्तों के आईने में झांकिए
जितनी बड़ी रस्में,उतने घायल रिश्ते हैं

बेड़ियों में कसे दो हाथ मुक्ति चाहते हैं
जितना ही चीखिये,उतना ही ये कसते हैं

रह रहे हैं एक वीराने शहर में,हम यारो,
आँखों में सुधियों के कई गाँव बसते हैं

***श्रवण*** (१२ दिसम्बर,१९७७)

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