Tuesday, January 31, 2012

पीड़ा को आस्तीन के सापों सा न पालिए...

दर्द सांसों में बसा हो तो उसे निकालिए
पीड़ा को आस्तीन के सापों सा न पालिए
इतनी ख़ुशियाँ हैं यहाँ ज़िंदगी में,यारो
उन्हें चुनिए,गुनिये,सहेजिये,सम्हालिए
***श्रवण***

कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है...

कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है
पर उसके दिल में एक कोयले की खान है
क़ाबिल-ए-गौर हैं उसकी यहाँ बेशर्मियाँ भी
कितना भी ज़लील करो,बड़ी सख्त जान है
***श्रवण***

करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो?

करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो
यहाँ का हर सख्श नारद हुआ है
हमने सीखा जो उड़ना तब तक
आकाश ही देखो नदारद हुआ है
***श्रवण***

Sunday, January 29, 2012

ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म

लोग भी क्यों प्यार-व्यार करते हैं
नक़ली रिश्तों से कारोबार करते हैं

वो अपने शीशे सम्हालकर रखना
लोग यहाँ पत्थर से वार करते हैं

वो जो करते हैं रोज सत्य की बातें
अंधेरों में झूठ का प्रचार करते हैं

इतने घपले किये हैं मान्यवर ने
कि अब समाज का सुधार करते हैं

कर दिया है जबसे नेत्रदान,यारो
वे किडनियों का व्योपार करते हैं

जिनके कतरे गए हैं पंख वे भी
उड़ानों पे खूब ऐतबार करते हैं

ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म
हम भी बाज़ीगरी से प्यार करते हैं
***श्रवण***

Saturday, January 28, 2012

मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना

मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना
इस तरह दिल की मेरी छोटी आरजू रखना

हो गए प्यार के लम्हे भी मुफलिसों जैसे
जिंदगी को हमने सिखाया जुस्तजू रखना

प्यास ही प्यास है अब अपना वजूद मगर
ऐ सहरा, तू समंदर की ज़रा आबरू रखना
***श्रवण***

हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते

हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते
हमारे बीच न फिर इतने शिकवे-गिले होते

उदास लम्हों को हम ख़ुशगवार कर लेते
वो मुहब्बत के फूल गर कभी खिले होते

जहाँ की रौनकें गर तुझसे मेहरबां होतीं
इस ज़िंदगी के कुछ और सिलसिले होते

तेरे साझे में छोटा घर कभी तामीर हो जाता
तमन्ना कब थी ऐसी कि हमारे भी किले होते

हमने माना कि हम ख़ामोश रहे हैं अक्सर
वो तेरे ख़ूबसूरत लब भी कभी तो हिले होते
***श्रवण***

Friday, January 27, 2012

स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ...

(एक)
नित तेरा प्रतिबिंब पाती रही आंखें
सुधियों में सहेज वही मधुर बातें
राह देखा किया हरदम सोच कर
यदि कहीं होते छिपे तुम लौट आते

(दो)
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ
पहले जड़ था अब मैं चेतन हो गया हूँ
पहले जलता था दीये-सा रात-दिन
प्यार की ज्वाला में अब खो गया हूँ
***श्रवण***