Friday, January 27, 2012

स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ...

(एक)
नित तेरा प्रतिबिंब पाती रही आंखें
सुधियों में सहेज वही मधुर बातें
राह देखा किया हरदम सोच कर
यदि कहीं होते छिपे तुम लौट आते

(दो)
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ
पहले जड़ था अब मैं चेतन हो गया हूँ
पहले जलता था दीये-सा रात-दिन
प्यार की ज्वाला में अब खो गया हूँ
***श्रवण***

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