हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते
हमारे बीच न फिर इतने शिकवे-गिले होते
उदास लम्हों को हम ख़ुशगवार कर लेते
वो मुहब्बत के फूल गर कभी खिले होते
जहाँ की रौनकें गर तुझसे मेहरबां होतीं
इस ज़िंदगी के कुछ और सिलसिले होते
तेरे साझे में छोटा घर कभी तामीर हो जाता
तमन्ना कब थी ऐसी कि हमारे भी किले होते
हमने माना कि हम ख़ामोश रहे हैं अक्सर
वो तेरे ख़ूबसूरत लब भी कभी तो हिले होते
***श्रवण***
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