Friday, May 6, 2011

ब्याज- सी खुशियाँ दुखों के मूलधन...

पत्थरों के शहर में,
बुतपरस्ती की लगी है
होड़ सी-

टूटे हुए चेहरे भरे आक्रोश,
हर गरीबी बांचती है
भूख के अखबार,
तसल्ली का ज़हर ओढ़े
सिसकते हर गली में
झोपड़ों के द्वार...

रोशनी लगती,
अंधेरों की सतह पर
कोढ़ सी-

फूल से बचपन बबूलों से घिरे,
दूधिया सपने बिखरते
बाँझ है योवन,
विषधरों के देश में
ब्याज- सी खुशियाँ
दुखों के मूलधन...

सरल रेखा थी जिंदगी,
हो गयी अब
कोण सी-

व्यवस्था है नपुंसक देश की,
इस तरफ हिंसा भड़कती
उस तरफ पथराव,
और सत्ता के सिपाही
कर रहे हैं केंद्र में
कुर्सियों के मोल-भाव...

यह छवि अपने वतन की,
मखमली पैबंद में भी
जोड़ सी-

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

हर तरफ बिकने लगे
धूप के अखबार
और मन के पांव
नापें बहुपाशों के
मधुर विस्तार-

विरह के दिन,हो गए,अभिसार के दिन.

नदी के तट से बंधा
कुहरा हुआ पाहुन
बंद ऑंखें बाँचती
भूलें हवा की
देह पर मीठी छुअन-

बन्धनों के दिन,हो गए,स्वीकार के दिन.

तन लिखे श्रृगार,मन
स्नेह की ऋचाएं
अधरों के कम्पित आश्वासन
मौन की भाषा से
भर रहे दिशाएं-

प्रतीक्षा के दिन,हो गए,अधिकार के दिन.

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

आओ कुछ विश्वास की बातें करें,

आओ कुछ विश्वास की बातें करें,
मरुस्थल में प्यास की बातें करें.

जीवन के हवनकुंड में
सपनों की आहुतियाँ
आशाओं की समिधाएँ हैं-
दर्द भरे चेहरे पर
व्यथा के अक्षत
दुखों के वेदमंत्र और
पीड़ा की ऋचाएं हैं-

इस कदर दरकी हुई धरती यहाँ,
क्यों न हम आकाश की बातें करें?

अश्रुओं से भीगता मन
कभी सहरा कभी पनघट
कभी दरिया हुआ है-
न जाने किस जनम
की प्यास को हमने
इन वीरानों में
आँखों से छुआ है-

चुभ रहे हैं विरह से भीगे हुए पल,
चलो,अब मधुमास की बातें करें.
(१७ अप्रैल,१९९२)

Saturday, April 30, 2011

जहाँ सागर हैं वहीँ तूफान होंगे

जहाँ सागर हैं वहीँ तूफ़ान होंगे
आग सीने में लिए इंसान होंगे

जितने गहरे दर्द अब सागर कहाँ
वो सफ़ीने बेवज़ह हैरान होंगे

खो गयी लहरें,किनारे प्यास से
मेरे घर इन दिनों मेहमान होंगे

मांझियों के गीत बोझिल हो गए
मछलियों के देश भी वीरान होंगे

बह रहा हूँ एक दरिया की तरह
कोई सागर तो मेरी पहचान होंगे

(११ अक्टूबर,१९८७)

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को

लफ़्ज़ों में न बांधो दास्तानों को
अब न पालो इन बहानों को

रोशनी का ख्वाब तोड़ने के लिए
यूँ न जलाओ अपने अरमानों को

दिल के जलने से खौफ़ होता ही
कहीं आग न लग जाये मकानों को

उनके हाथों में सियासत की शमा
क्या कहें मुल्क के परवानों को

मेरे ज़मीर की कीमत लगा रहे शायद
जिनकी बंदिश ने तपाया मेरे बयानों को

(२२ दिसंबर,१९७७)






Wednesday, January 12, 2011

राजधानी व्यस्त है,चुनाव है..

ज़िंदगी टूटी हुई-सी इक नाव है
बेबसी, नदी का इक बहाव है

भटकनों के शहर में हर आदमी
भीड़ में दर्द का इक ठहराव है

हममें, तुममें और हर इंसान में
प्यार की कोशिश नहीं,अलगाव है

बंदिशें अपने बयां पर ढोता हुआ
इन्सां नहीं,यह दहकता अलाव है

आग सीने में छिपाए क्या करे
सियासत की बर्फ़ से टकराव है

उतनी भीगी हुई ऑंखें नहीं हैं
जितने गहरे,पीर ओढ़े, घाव हैं

हर तरफ़ टूटे हुए हैं आईने
इस कदर इंसाफ़ में विखराव है

हादसों का दौर है, यारों यहाँ
भीड़ है, आक्रोश है, पथराव है

ज़िंदगी, तेरे लिए हम क्या करें
राजधानी व्यस्त है, चुनाव है

(१५ जुलाई,१९८४)

Tuesday, January 11, 2011

बेखुदी अपनी कुछ बेमानी लगती है
जिंदगी और भी पुरानी लगती है

ख़्वाब-दर-ख़्वाब आदमी के लिए
लम्हे-लम्हे की कहानी लगती है

फिर उजालों की फसल होगी यहाँ
हमको यह सोचकर हैरानी लगती है

उनको देखा तो दिल उदास हुआ
उनकी सूरत बहुत पहचानी लगती है

भुनकर खा रहे हैं मांस सभी
भूख इनकी कुछ जिस्मानी लगती है

दर्द कश्ती है और दुनिया की नदी
ऐसे में रात हर तूफानी लगती है

तू नहीं होती है जब पास मेरे
कोई किस्मत की बेईमानी लगती है

(०३ दिसंबर,१९७८)