आओ कुछ विश्वास की बातें करें,
मरुस्थल में प्यास की बातें करें.
जीवन के हवनकुंड में
सपनों की आहुतियाँ
आशाओं की समिधाएँ हैं-
दर्द भरे चेहरे पर
व्यथा के अक्षत
दुखों के वेदमंत्र और
पीड़ा की ऋचाएं हैं-
इस कदर दरकी हुई धरती यहाँ,
क्यों न हम आकाश की बातें करें?
अश्रुओं से भीगता मन
कभी सहरा कभी पनघट
कभी दरिया हुआ है-
न जाने किस जनम
की प्यास को हमने
इन वीरानों में
आँखों से छुआ है-
चुभ रहे हैं विरह से भीगे हुए पल,
चलो,अब मधुमास की बातें करें.
(१७ अप्रैल,१९९२)
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