Friday, May 6, 2011

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

हर तरफ बिकने लगे
धूप के अखबार
और मन के पांव
नापें बहुपाशों के
मधुर विस्तार-

विरह के दिन,हो गए,अभिसार के दिन.

नदी के तट से बंधा
कुहरा हुआ पाहुन
बंद ऑंखें बाँचती
भूलें हवा की
देह पर मीठी छुअन-

बन्धनों के दिन,हो गए,स्वीकार के दिन.

तन लिखे श्रृगार,मन
स्नेह की ऋचाएं
अधरों के कम्पित आश्वासन
मौन की भाषा से
भर रहे दिशाएं-

प्रतीक्षा के दिन,हो गए,अधिकार के दिन.

शीत के दिन,हो गए,मनुहार के दिन.

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