Friday, May 6, 2011

ब्याज- सी खुशियाँ दुखों के मूलधन...

पत्थरों के शहर में,
बुतपरस्ती की लगी है
होड़ सी-

टूटे हुए चेहरे भरे आक्रोश,
हर गरीबी बांचती है
भूख के अखबार,
तसल्ली का ज़हर ओढ़े
सिसकते हर गली में
झोपड़ों के द्वार...

रोशनी लगती,
अंधेरों की सतह पर
कोढ़ सी-

फूल से बचपन बबूलों से घिरे,
दूधिया सपने बिखरते
बाँझ है योवन,
विषधरों के देश में
ब्याज- सी खुशियाँ
दुखों के मूलधन...

सरल रेखा थी जिंदगी,
हो गयी अब
कोण सी-

व्यवस्था है नपुंसक देश की,
इस तरफ हिंसा भड़कती
उस तरफ पथराव,
और सत्ता के सिपाही
कर रहे हैं केंद्र में
कुर्सियों के मोल-भाव...

यह छवि अपने वतन की,
मखमली पैबंद में भी
जोड़ सी-

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