Friday, May 6, 2011

जाने कहाँ गया वह जंगल...

जाने कहाँ गया वह जंगल,

सागौन और महुए के पेड़ों से

भरा हुआ?


नैतिकताओं की नदियाँ,संस्कारों के नाले

परम्पराओं का निर्वाह करती हवाएं

खुशिओं की मुनादी करते पक्षी-गण

और संयमित जानवर,सुसंस्कृत जीव-जंतु-

न जाने कहाँ गया हमारा

वह प्यारा जंगल?


वे पक्षी,जानवर और जीव-जंतु

प्रकृति के नियमों में बंधे

इंसानों से बहुत ऊपर थे

क्योंकि वे स्वयं पर

नहीं करते थे झूठा गर्व..


न जाने क्या हुआ की जब से

शहरी दास्तान सुन लिया जंगल ने,

अपने आप पर और अपनी

सत्ता से हैरान रह गया है...


बहुत अकेला और वीरान

हो गया है अब जंगल-

चील और गिद्ध शहर जा बसे हैं,

चीतों और भेड़ियों ने

पहन लिया है लोकतंत्र को...


नहीं,जंगल अब नहीं है वहां,

जाकर अब वह भी

बस गया है शहर में..

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं

क्योंकि तुम मुझे

जितना ही बांधना चाहती हो

उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.


तुम्हारे आंसुओं का मैं

उपासक हूँ,क्योंकि उनसे

पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,

और सीख पाता हूँ हँसना;

खुश रहना.


तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से

प्रेरणा लेकर ही मैं

कई-कई बार रो सका हूँ;

सच्चे आंसू.


तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने

सुझाये हैं जीवन के रहस्य

और मेरे प्रति तुम्हारी

अगाध श्रद्धा ने ही

बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति

लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.


तुमने तो शायद

मधुर मिलन का विश्वास

संजोया था मन में..

बिछड़ गया हूँ इसीलिए

मैं तुमसे आखिर.

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

भ्रष्ट हैं अब आचरण, हो रहे हैं जिधर देखो अस्मिता के चीर-हरण!

भ्रष्ट हैं अब आचरण,

हो रहे हैं जिधर देखो

अस्मिता के चीर-हरण!


भ्रष्ट है अब वातावरण,

कौन सिखलाये हमें

लोभ से संवरण?


आस्था ने खो दिए आयाम

सपने टूटें पल-छिन अविराम

मन को छलता है विश्वास

झूठे लगते धरती-आकाश...


कहाँ है आशा की किरण,

जो निर्मल कर दे

अंधकारों के अंतःकरण?


चेहरे जो दिखते फूलों से

चुभते हैं निर्मम शूलों से

उजले जितने भी व्यक्तित्व

हैं बस कालिख के अस्तित्व...


सत्य बन गया कुम्भकरण,

कौन देगा पाप को

पुण्य भरे जागरण?


भ्रष्टाचार की चलें हवाएं

दूषित होती सभी दिशाएं

विषपायी हैं श्रद्धा के स्वर

खोये प्रेम के ढाई आखर...


नागफनी के अंकुरण,

देश के अभयारण्य में

भेड़ियों का विचरण!


जहरीले वातायन का विस्तार

देता अक्रोशों को आकार

नपुंसक होने लगे विरोध

पराजित होने लगे अनुरोध...


मिथ्या राह का अनुसरण,

दंश सहते जी रहे

ज़िंदगी के व्याकरण!


रोशनी जो क्षितिज के पार

मिटाएगी तमस का संसार

हम मिलजुल करें प्रयास

स्थापित हो फिर विश्वास...


भ्रष्ट न पाए कहीं शरण,

तभी होगा अतिशीघ्र

समस्या का निराकरण!

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं...

तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं

अब भी आजा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं


दर्द अंगारा बनके हमको रोशनी देगा

तेरे ज़ख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं


तेरे रोने से जो सावन कि घटायें बरसें

दिल से उन अश्कों का गुनहगार हूँ मैं


मन के आंगन में तेरा प्यार गवाही देगा

कैसे बतलाऊं कि अब तेरा क़र्ज़दार हूँ मैं


अपने सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना

हिस्सा बनना है मुझे तेरा, बेक़रार हूँ मैं

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि तुम आज भी ज़िंदा हो मेरे भीतर

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम

आज भी ज़िंदा हो

मेरे भीतर

एक लौ की तरह

झिलमिलाती हुई--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे मन की दरकती ज़मीन पर

आज भी बरसाती हो तुम

अपने प्यार-स्नेह की बूंदें

और स्वयं अंकुरित होती हो

जीवन की हरियाली बनकर--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे अंतर्मन में

आज भी गूंजती हो तुम

अपने द्वारा उच्चारित

मधुर शब्द बनकर

और भर देती हो

मेरे भीतर के गहन सन्नाटे को

अपनी गुनगुनाहट से--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम्हारी पीड़ा-व्यथा

निश-दिन,पल-पल

लिखती रहती है

मेरे अंतस के कागज़ पर

दर्द की इबारतें,

और तुम आंसू बनकर

निरंतर समाहित होती रहती हो

मेरी ह्रदय-सरिता में--


काश!मैं सहला पाता तुम्हारी पीड़ा

अपने अनचाहे स्पर्श से,

या तुम्हे छूकर;

या तुम्हारे हाथों को

अपने हाथों में लेकर;

या संभव होता,तो

तुम्हारे सर को

अपने अभागे कन्धों पर

टिका कर;

दे पाता तुम्हे

थोड़ी सी तसल्ली--

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

अब किससे कहें अपना मकां डूब रहा है


हर शाम मेरी आँखों से कहता है ये सूरज

मैं यहाँ डूब रहा हूँ ,तू वहां डूब रहा है


यादों ने ले लिया है मेरी,बाढ़ का रंग-रूप

ऐसे में जाने कौन कहाँ डूब रहा है


मंजिलें हैं, रास्ते हैं, पर सफ़र वीरान हैं

रेत पर क़दमों का निशां डूब रहा है


मुजरिमों के बीच फरयाद का क्या करें

मुखबिरों में अपना बयां डूब रहा है

(१७ फरवरी,१९७८)

मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले

तमन्ना थी कहीं, ऐ जिंदगी, तुझको बसर मिले
मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले

जहाँ दीवार की मानिंद ढहते जी रहे हैं लोग
उसी बस्ती में अपने काफ़िलों को हमसफ़र मिले

वो अफ़साने,जिन्हें दहलीज़ पर हम छोड़ आये थे
वही फिर आज तनहाई में क्यों मद्देनज़र मिले

इरादों की हवेली में ख़ुशी नासूर बनती है
तकाज़ों को हमारे जब तसल्ली का ज़हर मिले

कहीं पर वारदातें है, कहीं आतंक या पथराव
उठा लो कोई भी अखबार,ऐसी ही ख़बर मिले

शहर हो लाख दिलकश,वो फरेबों का करिश्मा है
करें गर बुतपरस्ती तो दुआओं में असर मिले

पहेली है अँधेरी रात, इसे हल करना ही होगा
करो अब खूं से चरागाँ कि मुकम्मल सहर मिले