भ्रष्ट हैं अब आचरण,
हो रहे हैं जिधर देखो
अस्मिता के चीर-हरण!
भ्रष्ट है अब वातावरण,
कौन सिखलाये हमें
लोभ से संवरण?
आस्था ने खो दिए आयाम
सपने टूटें पल-छिन अविराम
मन को छलता है विश्वास
झूठे लगते धरती-आकाश...
कहाँ है आशा की किरण,
जो निर्मल कर दे
अंधकारों के अंतःकरण?
चेहरे जो दिखते फूलों से
चुभते हैं निर्मम शूलों से
उजले जितने भी व्यक्तित्व
हैं बस कालिख के अस्तित्व...
सत्य बन गया कुम्भकरण,
कौन देगा पाप को
पुण्य भरे जागरण?
भ्रष्टाचार की चलें हवाएं
दूषित होती सभी दिशाएं
विषपायी हैं श्रद्धा के स्वर
खोये प्रेम के ढाई आखर...
नागफनी के अंकुरण,
देश के अभयारण्य में
भेड़ियों का विचरण!
जहरीले वातायन का विस्तार
देता अक्रोशों को आकार
नपुंसक होने लगे विरोध
पराजित होने लगे अनुरोध...
मिथ्या राह का अनुसरण,
दंश सहते जी रहे
ज़िंदगी के व्याकरण!
रोशनी जो क्षितिज के पार
मिटाएगी तमस का संसार
हम मिलजुल करें प्रयास
स्थापित हो फिर विश्वास...
भ्रष्ट न पाए कहीं शरण,
तभी होगा अतिशीघ्र
समस्या का निराकरण!
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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