तमन्ना थी कहीं, ऐ जिंदगी, तुझको बसर मिले
मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले
जहाँ दीवार की मानिंद ढहते जी रहे हैं लोग
उसी बस्ती में अपने काफ़िलों को हमसफ़र मिले
वो अफ़साने,जिन्हें दहलीज़ पर हम छोड़ आये थे
वही फिर आज तनहाई में क्यों मद्देनज़र मिले
इरादों की हवेली में ख़ुशी नासूर बनती है
तकाज़ों को हमारे जब तसल्ली का ज़हर मिले
कहीं पर वारदातें है, कहीं आतंक या पथराव
उठा लो कोई भी अखबार,ऐसी ही ख़बर मिले
शहर हो लाख दिलकश,वो फरेबों का करिश्मा है
करें गर बुतपरस्ती तो दुआओं में असर मिले
पहेली है अँधेरी रात, इसे हल करना ही होगा
करो अब खूं से चरागाँ कि मुकम्मल सहर मिले
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