Friday, May 6, 2011

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि तुम आज भी ज़िंदा हो मेरे भीतर

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम

आज भी ज़िंदा हो

मेरे भीतर

एक लौ की तरह

झिलमिलाती हुई--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे मन की दरकती ज़मीन पर

आज भी बरसाती हो तुम

अपने प्यार-स्नेह की बूंदें

और स्वयं अंकुरित होती हो

जीवन की हरियाली बनकर--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे अंतर्मन में

आज भी गूंजती हो तुम

अपने द्वारा उच्चारित

मधुर शब्द बनकर

और भर देती हो

मेरे भीतर के गहन सन्नाटे को

अपनी गुनगुनाहट से--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम्हारी पीड़ा-व्यथा

निश-दिन,पल-पल

लिखती रहती है

मेरे अंतस के कागज़ पर

दर्द की इबारतें,

और तुम आंसू बनकर

निरंतर समाहित होती रहती हो

मेरी ह्रदय-सरिता में--


काश!मैं सहला पाता तुम्हारी पीड़ा

अपने अनचाहे स्पर्श से,

या तुम्हे छूकर;

या तुम्हारे हाथों को

अपने हाथों में लेकर;

या संभव होता,तो

तुम्हारे सर को

अपने अभागे कन्धों पर

टिका कर;

दे पाता तुम्हे

थोड़ी सी तसल्ली--

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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