इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है
अब किससे कहें अपना मकां डूब रहा है
हर शाम मेरी आँखों से कहता है ये सूरज
मैं यहाँ डूब रहा हूँ ,तू वहां डूब रहा है
यादों ने ले लिया है मेरी,बाढ़ का रंग-रूप
ऐसे में जाने कौन कहाँ डूब रहा है
मंजिलें हैं, रास्ते हैं, पर सफ़र वीरान हैं
रेत पर क़दमों का निशां डूब रहा है
मुजरिमों के बीच फरयाद का क्या करें
मुखबिरों में अपना बयां डूब रहा है
(१७ फरवरी,१९७८)
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