Friday, May 6, 2011

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

अब किससे कहें अपना मकां डूब रहा है


हर शाम मेरी आँखों से कहता है ये सूरज

मैं यहाँ डूब रहा हूँ ,तू वहां डूब रहा है


यादों ने ले लिया है मेरी,बाढ़ का रंग-रूप

ऐसे में जाने कौन कहाँ डूब रहा है


मंजिलें हैं, रास्ते हैं, पर सफ़र वीरान हैं

रेत पर क़दमों का निशां डूब रहा है


मुजरिमों के बीच फरयाद का क्या करें

मुखबिरों में अपना बयां डूब रहा है

(१७ फरवरी,१९७८)

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