Monday, May 30, 2011

रेत का संसार हमारे सामने है..

रेत का संसार हमारे सामने है
सूखता घरबार हमारे सामने है

मृत होती हैं मधुर हवाएं देखो
सूना विस्तार हमारे सामने है

अब भी गर हम सम्हले नहीं
मृत्यु का कारोबार हमारे सामने है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है...

भरम शहर का मन में जब-तब टूटा है
पूछो न हमको किस-किस ने लूटा है

इस क़दर भागे हम परछाई के पीछे
अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है

जिन्दा रहना बोझ हमारे सर पर भारी
घनी धूप में हर दरख़्त हमसे रूठा है

महलों से संवाद बनाने वालो सुन लो
हम झोपड़ों के सर क्या-क्या फूटा है

अब तो सियासत के दावे-वादे पहचानो
सभी नमूनों का इक-इक लफ्ज़ झूठा है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में ...

मन की बात मन में ही,हाय रह गयी
वैसे जबान जाने क्या-क्या कह गयी

क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में
अपनी काया विरह-वेदना सह गयी

सुधियों की दीवार हमारी थाती थी
रिश्तों की आंधी में देखो ढह गयी
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)

मेरे शहर का अख़बार...

सनसनीखेज ख़बरों का बेताज बादशाह
मेरे शहर का अख़बार
बहुत लापरवाह हो गया है इन दिनों;
अब यह अजनबी और अविश्वसनीय
समाचारों से आतंकित करता है
मेरे शहर के लोगों को-


न कहीं हत्या के हैरतअंगेज कारनामे,
न कहीं बलात्कारों के सामाजिक समारोह,
अपहरण और डकैती के सांस्कृतिक
कार्यक्रम भी कहीं नहीं,
न कहीं कालाबाजारी न कहीं रिश्वतखोरी,
हिंसा,आतंक और पथराव का
कहीं नामोनिशान ही नहीं-


न जाने क्या हो गया है अख़बार को,
कि छापता है यह अनबूझ पहेली सी ख़बरें:-
हर महकमें में फ़ैल गया है ईमानदारी का ज़हर,
भ्रष्टाचार हफ़्तों से नदारद है शहर से,
अपराधी को सजा मिलती है
और बेगुनाह को न्याय,
न कोई कहीं भूखा है न नंगा,
गरीबी लापता है और
शहर कि लड़कियां तरसती हैं
कि कोई उन्हें छेड़े-


ख़बरों के ज़रिये खुद को बेचनेवाला
मेरे शहर का अख़बार अब
कोई भी नहीं खरीदता,क्योंकि
मेरे शहर के लोग
हत्या,बलात्कार और अपराधों के
स्वाद के आदी हो चुके हैं-


अब यह अख़बार मेरे शहर का
अविश्वसनीय अख़बार हो गया है...

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Sunday, May 22, 2011

झूठे होते ढाई-आखर...

हर तरफ फुफकारते हैं
धूप के विषधर,
फिर भी खिलते हैं
हमारे मन में गुलमोहर...

खो गए हैं हम बियाबानों में-
मन के थर्मामीटर में देखो
चढ़ता है अब पीड़ा का पारा,
कहीं हमको चीरता है
सुधियों का आरा

मरुस्थल की ज़िंदगी है
प्यास का लम्बा सफ़र,
सूख रहे गाँव-गाँव
स्नेह के नदी-पोखर...

समय का सन्यासी बंजारों सा,
अनकहे संवाद लेकर जी रही
आस्था वीरानों में,
आदमी के हक़ दिखते नहीं
आज के संविधानों में

कपट भरे वातायन में
भीतर कुछ है बाहर कुछ,
छलती हैं दुविधाएं पल-छिन
झूठे होते ढाई-आखर...

रोशनी के गीत रेहन हो गए,
सभ्यता के दंश हैं और
भ्रमित भावी पीढ़ियां,
अधोगामी हो रही हैं
नैतिकताओं की सीढ़ियां...

स्नेह के सन्दर्भ पनपे
जग की कटुता पाकर,
सारी बाजी जीती हमने
अपनों को तिल-तिल खोकर...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Tuesday, May 17, 2011

जिंदगी अब दर्द की जागीर है..,

जिंदगी अब दर्द की जागीर है
टूटी-बिखरी हाथ की लकीर है

ज़माना है और उसकी जिल्लतें
इन दिनों ये वक़्त भी बेपीर है

हर तरफ हैं भटकनों की रंजिशें
किस्मतों का फैसला आखीर है

पास अपने उलझनें ही उलझनें
हम भी यारो,बहुत ही अमीर हैं

है वही दुनिया की झूठी रौनकें
इन फरेबों की यही तासीर है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Monday, May 16, 2011

चाहत...

मेरी चाहतों को अपने रु-ब-रु रखना
इस तरह मेरे दिल की आबरू रखना