Monday, May 30, 2011

अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है...

भरम शहर का मन में जब-तब टूटा है
पूछो न हमको किस-किस ने लूटा है

इस क़दर भागे हम परछाई के पीछे
अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है

जिन्दा रहना बोझ हमारे सर पर भारी
घनी धूप में हर दरख़्त हमसे रूठा है

महलों से संवाद बनाने वालो सुन लो
हम झोपड़ों के सर क्या-क्या फूटा है

अब तो सियासत के दावे-वादे पहचानो
सभी नमूनों का इक-इक लफ्ज़ झूठा है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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