Monday, May 30, 2011

मेरे शहर का अख़बार...

सनसनीखेज ख़बरों का बेताज बादशाह
मेरे शहर का अख़बार
बहुत लापरवाह हो गया है इन दिनों;
अब यह अजनबी और अविश्वसनीय
समाचारों से आतंकित करता है
मेरे शहर के लोगों को-


न कहीं हत्या के हैरतअंगेज कारनामे,
न कहीं बलात्कारों के सामाजिक समारोह,
अपहरण और डकैती के सांस्कृतिक
कार्यक्रम भी कहीं नहीं,
न कहीं कालाबाजारी न कहीं रिश्वतखोरी,
हिंसा,आतंक और पथराव का
कहीं नामोनिशान ही नहीं-


न जाने क्या हो गया है अख़बार को,
कि छापता है यह अनबूझ पहेली सी ख़बरें:-
हर महकमें में फ़ैल गया है ईमानदारी का ज़हर,
भ्रष्टाचार हफ़्तों से नदारद है शहर से,
अपराधी को सजा मिलती है
और बेगुनाह को न्याय,
न कोई कहीं भूखा है न नंगा,
गरीबी लापता है और
शहर कि लड़कियां तरसती हैं
कि कोई उन्हें छेड़े-


ख़बरों के ज़रिये खुद को बेचनेवाला
मेरे शहर का अख़बार अब
कोई भी नहीं खरीदता,क्योंकि
मेरे शहर के लोग
हत्या,बलात्कार और अपराधों के
स्वाद के आदी हो चुके हैं-


अब यह अख़बार मेरे शहर का
अविश्वसनीय अख़बार हो गया है...

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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