हर तरफ फुफकारते हैं
धूप के विषधर,
फिर भी खिलते हैं
हमारे मन में गुलमोहर...
खो गए हैं हम बियाबानों में-
मन के थर्मामीटर में देखो
चढ़ता है अब पीड़ा का पारा,
कहीं हमको चीरता है
सुधियों का आरा
मरुस्थल की ज़िंदगी है
प्यास का लम्बा सफ़र,
सूख रहे गाँव-गाँव
स्नेह के नदी-पोखर...
समय का सन्यासी बंजारों सा,
अनकहे संवाद लेकर जी रही
आस्था वीरानों में,
आदमी के हक़ दिखते नहीं
आज के संविधानों में
कपट भरे वातायन में
भीतर कुछ है बाहर कुछ,
छलती हैं दुविधाएं पल-छिन
झूठे होते ढाई-आखर...
रोशनी के गीत रेहन हो गए,
सभ्यता के दंश हैं और
भ्रमित भावी पीढ़ियां,
अधोगामी हो रही हैं
नैतिकताओं की सीढ़ियां...
स्नेह के सन्दर्भ पनपे
जग की कटुता पाकर,
सारी बाजी जीती हमने
अपनों को तिल-तिल खोकर...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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