Sunday, June 19, 2011

चुभती मन को पीर पराई...

मरने से क्या डरना,भाई
पग-पग पर हैं बसे कसाई

अधिकारों की बात चली है
चल कर छेड़ें एक लड़ाई

संविधान की धाराओं में
हमने अपनी शाख गंवाई

गली-मोहल्ले सुलग रहे हैं
तुमने ही यह आग लगाई

सपनों की ताबीर लिखें पर
चुभती मन को पीर पराई

खिड़की है पर दृश्य नदारद
उन्नति से यह मिली कमाई

सुख ने हमको प्यासा रक्खा
दुःख ने अपनी प्यास बुझाई

चुभते हैं सुधियों के नश्तर
मन के पैरों फटी विमाई

खिलना था फूलों को लेकिन
काँटों ने क्यों बाड़ बिछाई

जिन्दा रहने की कोशिश में
मुर्दों को मिल गई ख़ुदाई

सागर तक न पहुंची नदियाँ
किसने उल्टी गंग बहाई

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Saturday, June 18, 2011

अन्नदाता हरित-क्रांति के सपूतों के नाम

कन्धों पर आकाश उठाये फिरते हैं
हरित-क्रांति के ये सपूत ही मरते हैं

धरती मां की कोख हरी करने वाले
मेहनतकश ये हाथ दुखों से गुजरते हैं

वसुंधरा है अन्नपूर्णा इनके दम से
क्यों ये तिल-तिल यहाँ बिखरते हैं

जीडीपी का भरम इन्ही से कायम है
इनकी ख़ातिर हम झूठा दम भरते हैं

ये ज़िंदा हैं जब तक हम भी ज़िंदा हैं
कर्ज़े इनके फिर क्यों नहीं उतरते हैं

@@स.सु.@@श्र.कु.उ.तिवारी

Friday, June 17, 2011

बोझा दिल पर,कंधे खाली...

बोझा दिल पर,कंधे खाली
हर आदम ख़ुद हुआ सवाली

इस जीवन में इतने बंधन
किस क़ीमत पर मिले बहाली

इस पीढ़ी को क्या दे पाए
खुली हवा में महल ख़याली

पीड़ा थी भूखे बच्चे की
ज़ार-ज़ार क्यों रोई प्याली

अपना दुखड़ा भूल-भाल कर
दूजों का दुःख रोई रुदाली

इतिहासों की बात करें क्या
वर्तमान जब हुआ मवाली

क़र्ज़ भरेगी आने वाली पीढ़ी
हमने हर ली सब हरियाली

ज़िंदा रहने की कोशिश,पर
समय फिरे है लिए दुनाली

सत्ता का दोहन करते हैं
जिनको करना है रखवाली

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है...

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है
जो अपने दर्द जज्ब कर ले,वही इन्सान महकता है

सुख-दुःख तो आते-जाते,तासीर मगर उल्टी पाई
दुःख में इन्सान संयमित,सुख में ही बहकता है
...
रिश्ते-नाते,रश्में-बंधन यूँ जीवन भर चलते रहते
कितना भी ठुकराओ,सुधियों का दंश लहकता है

जीवन जैसे एक जुआं हो या बाजी शतरंजों की
शह का मौका मिलते ही,ये शापित मन चहकता है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Thursday, June 16, 2011

एक गरीब विरहिणी की व्यथा-कथा

आषाढ़ के प्रथम दिवस पर एक गरीब विरहिणी
की व्यथा-कथा :-

''अबकी बरसात में जाने यह क्या हुआ
आँखों के साथ सारा का सारा घर चुआ''

Wednesday, June 15, 2011

दिल में इक ख़ुमार-सा है...

दिल में इक ख़ुमार-सा है
जो अनकहे प्यार-सा है

रोज आते हैं वो ख़्वाबों में
समां मौसमे-बहार-सा है

चाँद उतरा है इस झील में
मिलने का इंतज़ार-सा है

हवाओं में यूँ कशिश पाई
जुल्फ़ों से कारोबार-सा है

वो हंसी साथ,वो हंसी बातें
मीठे सपनों से,करार-सा है

ऐसे अंदाज़ से उठी वो नज़र
फिजां में इक गुबार-सा है

हम हैं या उनकी जुस्तजू है
यह नशा ख़ुशगवार-सा है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
१६/०५/२०११

Monday, June 13, 2011

सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है...

सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है
इनका ये रुख सालों से खूब जाना-पहचाना है

रहबरी को भूलकर ख़ुद हो गए हैं राहजन
अपना ये वतन कितना लगता बेगाना है

लूट रहे अस्मिता देखो अपने ही चमन की
जिससे जुड़ा इनका ख़ुद का आबो-दाना है

नोंच कर खा रहे हैं,इंसानी जिस्मों को
इनके जिस्मों में कोई हैवानी ताना-बाना है

चुनकर के आम ने ही बनाया है खास इन्हें
जो इनकी ख़ातिर महज़ इक वोटर पुराना है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)