कन्धों पर आकाश उठाये फिरते हैं
हरित-क्रांति के ये सपूत ही मरते हैं
धरती मां की कोख हरी करने वाले
मेहनतकश ये हाथ दुखों से गुजरते हैं
वसुंधरा है अन्नपूर्णा इनके दम से
क्यों ये तिल-तिल यहाँ बिखरते हैं
जीडीपी का भरम इन्ही से कायम है
इनकी ख़ातिर हम झूठा दम भरते हैं
ये ज़िंदा हैं जब तक हम भी ज़िंदा हैं
कर्ज़े इनके फिर क्यों नहीं उतरते हैं
@@स.सु.@@श्र.कु.उ.तिवारी
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