Friday, June 17, 2011

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है...

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है
जो अपने दर्द जज्ब कर ले,वही इन्सान महकता है

सुख-दुःख तो आते-जाते,तासीर मगर उल्टी पाई
दुःख में इन्सान संयमित,सुख में ही बहकता है
...
रिश्ते-नाते,रश्में-बंधन यूँ जीवन भर चलते रहते
कितना भी ठुकराओ,सुधियों का दंश लहकता है

जीवन जैसे एक जुआं हो या बाजी शतरंजों की
शह का मौका मिलते ही,ये शापित मन चहकता है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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