दिल में इक ख़ुमार-सा है
जो अनकहे प्यार-सा है
रोज आते हैं वो ख़्वाबों में
समां मौसमे-बहार-सा है
चाँद उतरा है इस झील में
मिलने का इंतज़ार-सा है
हवाओं में यूँ कशिश पाई
जुल्फ़ों से कारोबार-सा है
वो हंसी साथ,वो हंसी बातें
मीठे सपनों से,करार-सा है
ऐसे अंदाज़ से उठी वो नज़र
फिजां में इक गुबार-सा है
हम हैं या उनकी जुस्तजू है
यह नशा ख़ुशगवार-सा है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
१६/०५/२०११
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