ये नींद आंखों से मेरी क्यूं दूर हो गयी ?
अबे ! गोली इक नींद की खा तो सही !
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क्यों बार-बार मेरा रास्ता काटता है तू ?
ये काम बिल्ली को करने दे न,यार !
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यह हिमाक़त हो गई है मुझसे मेरी दिलरुबा
गिर पड़ा हूँ मैं तेरी रुखसार की उन खाईयों में
***श्रवण***
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कहीं उलझ न जाये फिर से ज़िंदगी, यारो
उनके बालों के ये ख़म मुझको दुआ देते हैं
***श्रवण***
Sunday, February 19, 2012
दस्तक देने वाली हैं
कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं
***श्रवण***
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं
***श्रवण***
चाहा था मैंने डूबना
चाहा था मैंने डूबना उन झील सी आँखों में
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में
***श्रवण***
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में
***श्रवण***
दूसरों के दर्द से
दर्द के बदले ख़ुशी मिलने लगी है आज कल
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग
***श्रवण***
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग
***श्रवण***
वो हरा करता रहा
मेरे ज़ख्मों पे जो गुज़रा वो हंसी मंज़र न पूछ
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा
***श्रवण***
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा
***श्रवण***
उनका वो यकीं
हाय ! मेरे दिल पे उनका वो यकीं जाता रहा
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का
***श्रवण***
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का
***श्रवण***
किस उम्मीद पर
इधर हालात बद से और बदतर होते जाते हैं
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ
***श्रवण***
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ
***श्रवण***
इकरार चाहत का
अंधेरों का जशन और तू भी शामिल हो गया उसमे
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?
***श्रवण***
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?
***श्रवण***
Saturday, February 18, 2012
बहुत हैं हम मगर इतने भी हम तो बेवफ़ा नहीं
कि उनके मुंह पे कैसे कह दें,उनमे भी वफ़ा नहीं
बहुत हैं हम मगर इतने भी हम तो बेवफ़ा नहीं
उधर हालात बद से और बदतर हो रहे दिन-रात
तआज्जुब ये कि अपने आप पे हम भी ख़फा नहीं
यहाँ बेख़ौफ़ हो कर जिसका चाहे दिल चुराइए
इधर कानून में इस ज़ुर्म की कोई दफ़ा नहीं
ज़माने के मुक़ाबिल हम खड़े हो जाएँ तो लेकिन
हिसाबी दिल मेरा सोचे कि सौदे में नफ़ा नहीं
हवाले कर दिया ख़ुद को तेरे और बाद में जाना
जफ़ा करने के लायक भी कहीं तुझमे जफ़ा नहीं
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
बहुत हैं हम मगर इतने भी हम तो बेवफ़ा नहीं
उधर हालात बद से और बदतर हो रहे दिन-रात
तआज्जुब ये कि अपने आप पे हम भी ख़फा नहीं
यहाँ बेख़ौफ़ हो कर जिसका चाहे दिल चुराइए
इधर कानून में इस ज़ुर्म की कोई दफ़ा नहीं
ज़माने के मुक़ाबिल हम खड़े हो जाएँ तो लेकिन
हिसाबी दिल मेरा सोचे कि सौदे में नफ़ा नहीं
हवाले कर दिया ख़ुद को तेरे और बाद में जाना
जफ़ा करने के लायक भी कहीं तुझमे जफ़ा नहीं
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
Monday, February 13, 2012
दुःख को रेहन स्वप्न हमारे...
जिंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे हैं
हमारे ख़्वाब टूटे हैं.
रोशनी के हाथों में बेड़ियां
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल मानो
जीतना हो जीवन का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो,करम फूटे हैं,
प्रायश्चित की हवेली में
हमारे दावे झूठे हैं.
कभी न पाई मंजिल लेकिन
भटक रहे मन के बंजारे
पीड़ा के पर्वत लांघे हैं
दुःख को रेहन स्वप्न हमारे
कहना है कितना कुछ
पर बंदिश के खूंटे हैं,
समय के सिपाहियों ने
हमारे पल-छिन लूटे हैं.
***श्रवण***
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे हैं
हमारे ख़्वाब टूटे हैं.
रोशनी के हाथों में बेड़ियां
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल मानो
जीतना हो जीवन का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो,करम फूटे हैं,
प्रायश्चित की हवेली में
हमारे दावे झूठे हैं.
कभी न पाई मंजिल लेकिन
भटक रहे मन के बंजारे
पीड़ा के पर्वत लांघे हैं
दुःख को रेहन स्वप्न हमारे
कहना है कितना कुछ
पर बंदिश के खूंटे हैं,
समय के सिपाहियों ने
हमारे पल-छिन लूटे हैं.
***श्रवण***
Thursday, February 9, 2012
फिर उठा तूफान क्या हम आज़माना छोड़ दें
फिर उठा तूफ़ान क्या हम आज़माना छोड़ दें
बिजलियों के डर से क्योंकर घर बनाना छोड़ दें
दर्द-ए-दरिया में हमारी नाव फिर से जा फंसी
दूर है साहिल तो क्यों हम मुस्कुराना छोड़ दें
हर तरफ आतंक है छाया हुआ इस दौर में
काश! हम अंदाज़ अपना वहशियाना छोड़ दें
प्यार में गाफ़िल हुए,रुसवाइयों का डर कहाँ
क्यों भला हम इश्क में लुटना-लुटाना छोड़ दें
हमसे उनको है अदावत,उनकी मर्ज़ी,क्या करें!
कैसे हम यूँ दिल की रस्मों को निभाना छोड़ दें
अब यहाँ पर ज़िंदगी का रुख़ बदलना चाहिए
नक़ली खुशियों का यहां,आओ बहाना छोड़ दें
गर बदलना चाहते हैं आज के हालात को
हम आईनों से बेहिचक आंखें चुराना छोड़ दें
***श्रवण***
बिजलियों के डर से क्योंकर घर बनाना छोड़ दें
दर्द-ए-दरिया में हमारी नाव फिर से जा फंसी
दूर है साहिल तो क्यों हम मुस्कुराना छोड़ दें
हर तरफ आतंक है छाया हुआ इस दौर में
काश! हम अंदाज़ अपना वहशियाना छोड़ दें
प्यार में गाफ़िल हुए,रुसवाइयों का डर कहाँ
क्यों भला हम इश्क में लुटना-लुटाना छोड़ दें
हमसे उनको है अदावत,उनकी मर्ज़ी,क्या करें!
कैसे हम यूँ दिल की रस्मों को निभाना छोड़ दें
अब यहाँ पर ज़िंदगी का रुख़ बदलना चाहिए
नक़ली खुशियों का यहां,आओ बहाना छोड़ दें
गर बदलना चाहते हैं आज के हालात को
हम आईनों से बेहिचक आंखें चुराना छोड़ दें
***श्रवण***
जितना ऊँचा क़द,हैं उतने ही छोटे लोग
जितना ऊँचा क़द,हैं उतने ही छोटे लोग
लुढ़क रहे हर ओर,बिन पेंदी के लोटे लोग
शरम-हया की बातें सारी बेमानी लगतीं
नक़ली चमक दिखाते अपनी खोटे लोग
***श्रवण***
लुढ़क रहे हर ओर,बिन पेंदी के लोटे लोग
शरम-हया की बातें सारी बेमानी लगतीं
नक़ली चमक दिखाते अपनी खोटे लोग
***श्रवण***
Wednesday, February 8, 2012
पत्थर का ज़िगर हो तो मन मोम का रखना
पत्थर का ज़िगर हो तो मन मोम का रखना
कभी रोम में रहना तो रहन रोम का रखना
अपने को गर बचाना हो अहम् के घमंड से
तो ज़िंदगी में अपना वज़न फोम का रखना
***श्रवण***
कभी रोम में रहना तो रहन रोम का रखना
अपने को गर बचाना हो अहम् के घमंड से
तो ज़िंदगी में अपना वज़न फोम का रखना
***श्रवण***
राहबर सोये पड़े हैं सियासत की सेजों में
राहबर सोये पड़े हैं सियासत की सेजों में
ज़िंदगी है क़ैद यहाँ दर्द के दस्तावेज़ों में
परचम लहराया चुनाव का लो भेड़ियों ने
मगर ने ऑंखें गड़ाईं बन्दर के कालेजों में
खुले आम लूट लिया तुमने इस देश को
हमको उलझाये रखा व्यर्थ के परहेजों में
वोट है कुंवारी कन्या,दूल्हों से प्रत्याशी
लुटा दिया वोटर ने जनमत दहेजों में
निगला है फिर से दूध की मक्खियों को
जनता का रुख़ ऐसा कैसे घुसे भेजों में
***श्रवण***
ज़िंदगी है क़ैद यहाँ दर्द के दस्तावेज़ों में
परचम लहराया चुनाव का लो भेड़ियों ने
मगर ने ऑंखें गड़ाईं बन्दर के कालेजों में
खुले आम लूट लिया तुमने इस देश को
हमको उलझाये रखा व्यर्थ के परहेजों में
वोट है कुंवारी कन्या,दूल्हों से प्रत्याशी
लुटा दिया वोटर ने जनमत दहेजों में
निगला है फिर से दूध की मक्खियों को
जनता का रुख़ ऐसा कैसे घुसे भेजों में
***श्रवण***
लोग छोटे-छोटे घरों में रहते हैं...
लोग छोटे-छोटे घरों में रहते हैं
कुछ भी छुपाने की वज़ह नहीं है
ज़िंदगी को बचाना है बेहद ज़रूरी
चरित्र के लिए कहीं जगह नहीं है
***श्रवण***
कुछ भी छुपाने की वज़ह नहीं है
ज़िंदगी को बचाना है बेहद ज़रूरी
चरित्र के लिए कहीं जगह नहीं है
***श्रवण***
तेरी सोहबत ने बदले हैं...
तेरी सोहबत ने बदले हैं यहाँ प्यार के मानी
वफ़ा को ले गया तू बेवफ़ाई के कगारों तक
***श्रवण***
वफ़ा को ले गया तू बेवफ़ाई के कगारों तक
***श्रवण***
ख़लिश हो या कि रंजिश...
ख़लिश हो या कि रंजिश,ये तेरी ही खुदाई है
तेरे नाख़ून की तासीर इन ज़ख्मों ने बताई है
***श्रवण***
तेरे नाख़ून की तासीर इन ज़ख्मों ने बताई है
***श्रवण***
दोनों का बुरा हाल हुआ...
दोनों का बुरा हाल हुआ
तेरे इश्क में,
एक रो रहा बिछड़कर
एक जुड़के रो रहा.
***श्रवण***
तेरे इश्क में,
एक रो रहा बिछड़कर
एक जुड़के रो रहा.
***श्रवण***
मेरे दिल को जला-जला
न सही मैं मगर दिल तो मेरा कुछ काम आया है
मेरे दिल को जला-जला कर उसने रोटियां सेंकीं
सुप्रभात..
***श्रवण***
मेरे दिल को जला-जला कर उसने रोटियां सेंकीं
सुप्रभात..
***श्रवण***
उनकी ख़ूबी से अभी...
उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है
***श्रवण***
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है
***श्रवण***
तेरे सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना
तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं
अब भी आ जा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं
मन के आँगन में तेरा प्यार गवाही देगा
तेरे दिल की चाहतों का गुनहगार हूँ मैं
दर्द अंगारा बन के हमको रोशनी देगा
तेरे जख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं
तेरे सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना
हिस्सा बनना है मुझे तेरा,बेक़रार हूँ मैं
***श्रवण***
अब भी आ जा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं
मन के आँगन में तेरा प्यार गवाही देगा
तेरे दिल की चाहतों का गुनहगार हूँ मैं
दर्द अंगारा बन के हमको रोशनी देगा
तेरे जख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं
तेरे सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना
हिस्सा बनना है मुझे तेरा,बेक़रार हूँ मैं
***श्रवण***
इस शाम से पहले का शमां डूब रहा है
इस शाम से पहले का शमां डूब रहा है
ये मन तन्हां-तन्हां क्यों डूब रहा है
पश्चिम में डूबता हुआ कहता है सूरज
मैं यहाँ डूब रहा हूँ,तू वहां डूब रहा है
***श्रवण***
ये मन तन्हां-तन्हां क्यों डूब रहा है
पश्चिम में डूबता हुआ कहता है सूरज
मैं यहाँ डूब रहा हूँ,तू वहां डूब रहा है
***श्रवण***
फिर उतर आइ कहीं से..
फिर उतर आइ कहीं से
ये उदास-सी शाम,
फिर तेरी याद की शहनाई बजी,
फिर कहीं खिल उठे ख़यालों में
तेरी मुस्कुराहटों के फूल,
फिर कहीं कांपती लहरों से उठे
शाम के शोक गीत,
फिर कहीं रात हुई,
दर्द के जल उठे चिराग.
***श्रवण***
ये उदास-सी शाम,
फिर तेरी याद की शहनाई बजी,
फिर कहीं खिल उठे ख़यालों में
तेरी मुस्कुराहटों के फूल,
फिर कहीं कांपती लहरों से उठे
शाम के शोक गीत,
फिर कहीं रात हुई,
दर्द के जल उठे चिराग.
***श्रवण***
Wednesday, February 1, 2012
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गए...
वो जो हमको देते थे नसीहतें दिन-रात
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गए
उजले कपड़ों में जो ख़ुद को यूँ छिपाए थे
उन सफ़ेदपोशों को हम भी पहचान गए
ज़िंदगी इस क़दर उलझी कि यहाँ,यारो
बहुत सम्हाला पर वो सारे अरमान गए
जिसने आवाज़ उठाई जुल्मों के ख़िलाफ़
ऐसे हर सख्श पर हम यहाँ कुर्बान गए
जिन निगाहों से हम घायल हुए बार-बार
लगता है उन नज़रों के वे तीर-कमान गए
***श्रवण***
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गए
उजले कपड़ों में जो ख़ुद को यूँ छिपाए थे
उन सफ़ेदपोशों को हम भी पहचान गए
ज़िंदगी इस क़दर उलझी कि यहाँ,यारो
बहुत सम्हाला पर वो सारे अरमान गए
जिसने आवाज़ उठाई जुल्मों के ख़िलाफ़
ऐसे हर सख्श पर हम यहाँ कुर्बान गए
जिन निगाहों से हम घायल हुए बार-बार
लगता है उन नज़रों के वे तीर-कमान गए
***श्रवण***
जाती शीत-आती गर्मी,मनभावन यह संधिकाल है
जाती शीत-आती गर्मी,मनभावन यह संधिकाल है
पुरवईया के झोंकों में बस तेरा ही ख़्वाबो-ख़याल है
मीठे-मीठे रिश्तों सी यह गुनगुन लगती धूप खिली
रोको मत बिरही मन को,आओ भी, दिल का सवाल है!
***श्रवण***...
पुरवईया के झोंकों में बस तेरा ही ख़्वाबो-ख़याल है
मीठे-मीठे रिश्तों सी यह गुनगुन लगती धूप खिली
रोको मत बिरही मन को,आओ भी, दिल का सवाल है!
***श्रवण***...
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